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Samveda Mantra 817

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- अहमीयुराङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
स꣡म्मि꣢श्लो अरु꣣षो꣡ भु꣢वः सूप꣣स्था꣡भि꣣र्न꣢ धे꣣नु꣡भिः꣢ । सी꣡द꣢ञ्छ्ये꣣नो꣢꣫ न यो꣣निमा꣢ ॥८१७॥

सं꣡मि꣢꣯श्लः । सम् । मि꣣श्लः । अरुषः꣢ । भु꣣वः । सूपस्था꣡भिः꣢ । सु꣣ । उपस्था꣡भिः꣢ । न । धे꣣नु꣡भिः꣢ । सी꣡द꣢꣯न् । श्ये꣣नः꣢ । न । यो꣡नि꣢꣯म् । आ ॥८१७॥

Mantra without Swara
सम्मिश्लो अरुषो भुवः सूपस्थाभिर्न धेनुभिः । सीदञ्छ्येनो न योनिमा ॥

संमिश्लः । सम् । मिश्लः । अरुषः । भुवः । सूपस्थाभिः । सु । उपस्थाभिः । न । धेनुभिः । सीदन् । श्येनः । न । योनिम् । आ ॥८१७॥

Samveda - Mantra Number : 817
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 5;

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Meaning
हे पवमान सोम अर्थात् पवित्रकर्त्ता, सद्गुणकर्मस्वभावप्रेरक परमात्मन् वा आचार्य ! (अरुषः) तेज से देदीप्यमान आप (सूपस्थाभिः धेनुभिः) भली-भाँति उपस्थित तृप्तिप्रद स्तुतिवाणियों वा गायों से (न) इस समय (सम्मिश्लः) सम्मानित (भुवः) होवो। और, (श्येनः योनिं न) बाज पक्षी जैसे आवासवृक्ष पर अथवा सूर्य जैसे द्युलोकरूप घर में स्थित होता है, वैसे ही (श्येनः) प्रशंसनीय गतिवाले आप (योनिम्) हृदय-मन्दिर वा गुरुकुलरूप गृह में (आसीदन्) निवास करनेवाले (भुवः) होवो ॥३॥ इस मन्त्र में श्लिष्टोपमालङ्कार है ॥३॥
Essence
जैसे द्रोणकलश में स्थापित सोमरस गोदुग्ध के साथ मिश्रित कर सम्मानित किया जाता है, वैसे ही हृदय-गृह में स्थापित परमेश्वर का स्तुति-वाणियों से और गुरुकुल में स्थापित आचार्य का धेनुओं से सम्मान करना चाहिए ॥३॥
Subject
अगले मन्त्र में परमेश्वर और आचार्य से प्रार्थना की गयी है।