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Samveda Mantra 814

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- नृमेध आङ्गिरसः Chhand- प्रगाथः(विषमा बृहती, समा सतोबृहती) Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
म꣡त्स्वा꣢ सुशिप्रिन्हरिव꣣स्त꣡मी꣢महे꣣ त्व꣡या꣢ भूषन्ति वे꣣ध꣡सः꣢ । त꣢व꣣ श्र꣡वा꣢ꣳस्युप꣣मा꣡न्यु꣢क्थ्य सु꣣ते꣡ष्वि꣢न्द्र गिर्वणः ॥८१४॥

म꣡त्स्व꣢꣯ । सु꣣शिप्रिन् । सु । शिप्रिन् । हरिवः । त꣢म् । ई꣣महे । त्व꣡या꣢꣯ । भू꣣षन्ति । वे꣡धसः꣢ । त꣡व꣢꣯ । श्र꣡वा꣢꣯ꣳसि । उ꣣प꣡मानि꣡ । उ꣣प । मा꣡नि꣢꣯ । उ꣡क्थ्य । सुते꣡षु꣢ । इ꣢न्द्र । गिर्वणः । गिः । वनः ॥८१४॥

Mantra without Swara
मत्स्वा सुशिप्रिन्हरिवस्तमीमहे त्वया भूषन्ति वेधसः । तव श्रवाꣳस्युपमान्युक्थ्य सुतेष्विन्द्र गिर्वणः ॥

मत्स्व । सुशिप्रिन् । सु । शिप्रिन् । हरिवः । तम् । ईमहे । त्वया । भूषन्ति । वेधसः । तव । श्रवाꣳसि । उपमानि । उप । मानि । उक्थ्य । सुतेषु । इन्द्र । गिर्वणः । गिः । वनः ॥८१४॥

Samveda - Mantra Number : 814
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 4;

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Meaning
हे (सुशिप्रिन्) सर्वान्तर्यामी, (हरिवः) आकर्षणशील सूर्य, चन्द्र आदि लोकों के स्वामी परमात्मन् ! आप (मत्स्व) हमें आनन्दित कीजिए। (तम्) उन आनन्दप्रद आपसे हम (ईमहे) याचना करते हैं। (वेधसः) मेधावी उपासक (त्वया) आप से (भूषन्ति) स्वयं को अलङ्कृत करते हैं। हे (उक्थ्य) प्रशंसनीय, (गिर्वणः) वाणियों से संभजनीय (इन्द्र) जगदीश्वर ! (तव) आपके (श्रवांसि) यश (सुतेषु) आपके पुत्र मनुष्यों में (उपमानि) उपमान योग्य होते हैं, अर्थात् मनुष्यों के यश परमात्मा के यशों के समान उज्ज्वल हों, इस प्रकार उपमान बनते हैं ॥२॥
Essence
हृदय में परमात्मा को धारण करने से ही लोग अलङ्कृत होते हैं, शरीर के अङ्गों में कटक, कुण्डल, स्वर्णहार आदि धारण करने से नहीं ॥२॥ इस खण्ड में विद्वानों का और आचार्य का ब्रह्मविद्या में योगदान कहकर जीवात्मा और परमात्मा के विषय का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति जाननी चाहिए ॥ तृतीय अध्याय में चतुर्थ खण्ड समाप्त ॥
Subject
अगले मन्त्र में गुरुओं के भी गुरु परमात्मा की स्तुति है।

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