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Samveda Mantra 800

1875 Mantra
Devata- इन्द्राग्नी Rishi- वसिष्ठो मैत्रावरुणिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
इ꣡न्द्रे꣢ अ꣣ग्ना꣡ नमो꣢꣯ बृ꣣ह꣡त्सु꣢वृ꣣क्ति꣡मेर꣢꣯यामहे । धि꣣या꣡ धेना꣢꣯ अव꣣स्य꣡वः꣢ ॥८००॥

इ꣡न्द्रे꣢꣯ । अ꣣ग्ना꣢ । न꣡मः꣢꣯ । बृ꣣ह꣢त् । सु꣣वृक्ति꣢म् । सु꣣ । वृक्ति꣢म् । आ । ई꣣रयामहे । धिया꣢ । धे꣡नाः꣣ । अ꣣वस्य꣡वः꣢ ॥८००॥

Mantra without Swara
इन्द्रे अग्ना नमो बृहत्सुवृक्तिमेरयामहे । धिया धेना अवस्यवः ॥

इन्द्रे । अग्ना । नमः । बृहत् । सुवृक्तिम् । सु । वृक्तिम् । आ । ईरयामहे । धिया । धेनाः । अवस्यवः ॥८००॥

Samveda - Mantra Number : 800
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 2;

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Meaning
(अवस्यवः) रक्षा के इच्छुक, हम लोग (इन्द्रे)जीवात्मा को लक्ष्य करके (बृहत्) महान् (नमः) नमस्कार को, (सुवृक्तिम्) निर्दोष क्रिया को और (धिया) ध्यान तथा बुद्धि के साथ (धेनाः) स्तुतिरूप वाणियों को (आ ईरयामहे) प्रेरित करते हैं ॥१॥
Essence
परमात्मा की उपासना के लिए और जीवात्मा को उद्बोधन देने के लिए नमस्कार, गुणवर्णनरूप स्तुति और तदनुरूप क्रिया निरन्तर अपेक्षित होती है। पुरुषार्थ के बिना केवल नमस्कार से या स्तुति से कुछ भी नहीं सिद्ध होता ॥१॥
Subject
प्रथम मन्त्र में इन्द्र और अग्नि के नाम से जीवात्मा-परमात्मा का विषय वर्णित है।

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