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Samveda Mantra 80

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- पायुर्भारद्वाजः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
स꣣ना꣡द꣢ग्ने मृणसि यातु꣣धा꣢ना꣣न्न꣢ त्वा꣣ र꣡क्षा꣢ꣳसि꣣ पृ꣡त꣢नासु जिग्युः । अ꣡नु꣢ दह स꣣ह꣡मू꣢रान्क꣣या꣢दो꣣ मा꣡ ते꣢ हे꣣त्या꣡ मु꣢क्षत꣣ दै꣡व्या꣢याः ॥८०॥

स꣣ना꣢त् । अ꣣ग्ने । मृणसि । यातुधा꣡ना꣢न् । या꣣तु । धा꣡ना꣢꣯न् । न । त्वा꣣ । र꣡क्षाँ꣢꣯सि । पृ꣡त꣢꣯नासु । जि꣣ग्युः । अ꣡नु꣢꣯ । द꣣ह । सह꣡मू꣢रान् । स꣣ह꣢ । मू꣣रान् । क꣣या꣡दः꣢ । क꣣य । अ꣡दः꣢꣯ । मा । ते꣣ । हेत्याः꣢ । मु꣣क्षत । दै꣡व्या꣢꣯याः ॥८०॥

Mantra without Swara
सनादग्ने मृणसि यातुधानान्न त्वा रक्षाꣳसि पृतनासु जिग्युः । अनु दह सहमूरान्कयादो मा ते हेत्या मुक्षत दैव्यायाः ॥

सनात् । अग्ने । मृणसि । यातुधानान् । यातु । धानान् । न । त्वा । रक्षाँसि । पृतनासु । जिग्युः । अनु । दह । सहमूरान् । सह । मूरान् । कयादः । कय । अदः । मा । ते । हेत्याः । मुक्षत । दैव्यायाः ॥८०॥

Samveda - Mantra Number : 80
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 8;

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अग्ने) अग्रणी परमात्मन् ! अथवा शत्रुसंहारक राजन् ! आप (सनात्) चिरकाल से (यातुधानान्) पीड़ादायक, घात-पात, हिंसा, उपद्रव आदि दोषों को और दुष्टजनों को (मृणसि) विनष्ट करते आये हो। (रक्षांसि) काम-क्रोध-लोभ आदि और ठग-लुटेरे-चोर आदि राक्षस (त्वा) आपको (पृतनासु) आन्तरिक और बाह्य देवासुर-संग्रामों में (न जिग्युः) नहीं जीत पाते। आप (कयादः) सुख-नाशक दुर्विचारों तथा दुष्टजनों को (सहमूरान्) समूल (अनुदह) एक-एक करके भस्म कर दीजिए। (ते) वे दुष्टभाव और दुष्टजन (ते) आपके (दैव्यायाः) विद्वज्जनों का हित करनेवाले (हेत्याः) दण्डशक्तिरूप वज्र से एवं शस्त्रास्त्रों से (मा मुक्षत) न छूट सकें ॥८॥ इस मन्त्र में अर्थश्लेषालङ्कार है, वीर रस है ॥८॥
Essence
हे धर्मपालक, विधर्मविध्वंसक, सद्गुणप्रसारक जगदीश्वर वा राजन् ! आपके प्रशंसक हम जब-जब मानसिक या बाह्य देवासुर-संग्राम में काम-क्रोध-लोभ-मोह आदिकों में और ठग-लुटेरे-हिंसक-चोर-शराबी-व्यभिचारी-भ्रष्टाचारी आदि दुष्टजनों से पीड़ित हों, तब-तब आप हमारे सहायक होकर उन्हें जड़-समेत नष्ट करके हमारी रक्षा कीजिए। दुर्जनों का यदि हृदय-परिवर्तन सम्भव हो तो उनका राक्षसत्व नष्ट करके उन्हें शुद्ध अन्तःकरणवाला कर दीजिए, जिससे संसार में सज्जनों की वृद्धि से सर्वत्र सुख और सौहार्द की धारा प्रवाहित हो ॥८॥ इस दशति में परमात्माग्नि को जागृत करने का, अग्नि, पूषन् और जातवेदस् नामों से परमात्मा के गुणों का और उसके द्वारा किये जानेवाले राक्षस-विनाश का वर्णन होने से तथा मनुष्यों को परमात्मा की पूजा की प्रेरणा किये जाने से इस दशति के विषय की पूर्व दशति के विषय के साथ संगति है ॥ प्रथम प्रपाठक में द्वितीय अर्ध की तृतीय दशति समाप्त ॥ प्रथम अध्याय में अष्टम खण्ड समाप्त ॥
Subject
अगले मन्त्र में परमात्मा और राजा से राक्षस-संहार की प्रार्थना की गयी है।