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Samveda Mantra 796

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
इ꣢न्द्र꣣मि꣢द्गा꣣थि꣡नो꣢ बृ꣣ह꣡दिन्द्र꣢꣯म꣣र्के꣡भि꣢र꣣र्कि꣡णः꣢ । इ꣢न्द्रं꣣ वा꣡णी꣢रनूषत ॥७९६॥

इ꣡न्द्र꣢꣯म् । इत् । गा꣣थि꣡नः꣢ । बृ꣣ह꣢त् । इ꣡न्द्र꣢꣯म् । अ꣣र्के꣡भिः꣢ । अ꣣र्कि꣡णः꣢ । इ꣡न्द्र꣢꣯म् । वा꣡णीः꣢꣯ । अ꣣नूषत ॥७९६॥

Mantra without Swara
इन्द्रमिद्गाथिनो बृहदिन्द्रमर्केभिरर्किणः । इन्द्रं वाणीरनूषत ॥

इन्द्रम् । इत् । गाथिनः । बृहत् । इन्द्रम् । अर्केभिः । अर्किणः । इन्द्रम् । वाणीः । अनूषत ॥७९६॥

Samveda - Mantra Number : 796
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 2;

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1 Bhashyas
Meaning
(इन्द्रम्) देह के अधिष्ठाता, काम-क्रोध आदि शत्रुओं को पराजित करनेवाले वीर जीवात्मा की (इत्) निश्चय ही (गाथिनः) गायक लोग (बृहत्) बहुत अधिक (अनूषत) स्तुति करते हैं। (इन्द्रम्) जीवात्मा की (अर्किणः) मन्त्रपाठी लोग (अर्कैः) वेदमन्त्रों से (अनूषत) स्तुति करते हैं। (इन्द्रम्) उसी जीवात्मा की (वाणीः) अन्य वाणियाँ (अनूषत) स्तुति करती हैं ॥१॥
Essence
जीवात्मा ही देहराज्य का सम्राट् है, जो मन, बुद्धि, प्राण, इन्द्रिय आदियों को यथास्थान बैठाकर देहराज्य का सञ्चालन करता है ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा पूर्वार्चिक में १९८ क्रमाङ्क पर परमात्मा के पक्ष में व्याख्यात की जा चुकी है। यहाँ जीवात्मा का विषय कहा जा रहा है।