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Samveda Mantra 786

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- भृगुर्वारुणिर्जमदग्निर्भार्गवो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
आ꣡ प꣢वस्व सु꣣वी꣢र्यं꣣ म꣡न्द꣢मानः स्वायुध । इ꣣हो꣡ ष्वि꣢न्द꣣वा꣡ ग꣢हि ॥७८६॥

आ꣢ । प꣣वस्व । सुवी꣡र्य꣢म् । सु꣣ । वी꣡र्य꣢꣯म् । म꣡न्द꣢꣯मानः । स्वा꣣युध । सु । आयुध । इ꣢ह । उ꣣ । सु꣢ । इ꣣न्दो । आ꣢ । ग꣣हि ॥७८६॥

Mantra without Swara
आ पवस्व सुवीर्यं मन्दमानः स्वायुध । इहो ष्विन्दवा गहि ॥

आ । पवस्व । सुवीर्यम् । सु । वीर्यम् । मन्दमानः । स्वायुध । सु । आयुध । इह । उ । सु । इन्दो । आ । गहि ॥७८६॥

Samveda - Mantra Number : 786
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 1;

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Meaning
हे (स्वायुध) उत्कृष्ट दण्डसामर्थ्यवाले जगदीश्वर तथा तीक्ष्ण शस्त्रास्त्रों से सुसज्जित राजन् ! (मन्दमानः) प्रसन्न होते हुए आप (सुवीर्यम्) श्रेष्ठ आत्मबल, धैर्यबल, उत्साहबल और शारीरिक बल को (आ पवस्व) हमारे अन्दर प्रवाहित कीजिए। हे (इन्दो)तेजस्वी राजराजेश्वर परमात्मन् और राजन् ! आप(इह उ) यहाँ हमारे हृदय में वा राजगद्दी पर (सु आगहि) भली-भाँति पधारिए ॥३॥
Essence
जैसे परमात्मा अपने उपासकों का हार्दिक निवेदन सुनकर सज्जनों को उत्साहित और दुर्जनों को दण्डित करता है, वैसे ही राजा को चाहिए कि वह राष्ट्रवासियों का निवेदन सुनकर प्रजा को रक्षित और उत्साहित करे तथा पापी शत्रुओं को बन्दूक, तोप, आकाशीय गोले आदि हथियारों से विनष्ट करे ॥३॥
Subject
अगले मन्त्र में फिर वही विषय वर्णित है।

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