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Samveda Mantra 782

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- कश्यपो मारीचः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
वृ꣡ष्ण꣢स्ते꣣ वृ꣢ष्ण्य꣣ꣳ श꣢वो꣣ वृ꣢षा꣣ व꣢नं꣣ वृ꣡षा꣢ सु꣣तः꣢ । स꣡ त्वं वृ꣢꣯ष꣣न्वृ꣡षेद꣢꣯सि ॥७८२॥

वृ꣡ष꣢꣯णः । ते꣣ । वृ꣡ष्ण्य꣢꣯म् । श꣡वः꣢꣯ । वृ꣡षा꣢꣯ । व꣡न꣢꣯म् । वृ꣡षा꣢꣯ । सु꣣तः꣢ । सः । त्वम् । वृ꣣षन् । वृ꣡षा꣢꣯ । इत् । अ꣣सि ॥७८२॥

Mantra without Swara
वृष्णस्ते वृष्ण्यꣳ शवो वृषा वनं वृषा सुतः । स त्वं वृषन्वृषेदसि ॥

वृषणः । ते । वृष्ण्यम् । शवः । वृषा । वनम् । वृषा । सुतः । सः । त्वम् । वृषन् । वृषा । इत् । असि ॥७८२॥

Samveda - Mantra Number : 782
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 1;

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Meaning
हे (वृषन्) सुख, सम्पत्ति, विद्या आदि की वर्षा करनेवाले परमात्मन्, आचार्य और राजन् ! (वृष्णः ते) वर्षक आपका (शवः) बल (वृष्ण्यम्) सुख, शान्ति, धन आदि की वर्षा करने के स्वभाववाला है। आपका (वनम्) तेज भी (वृषा) सुख आदि की वर्षा करनेवाला है। (सुतः) आपसे उत्पन्न किया गया वृष्टिरस, विद्यारस और रक्षारस भी (वृषा) सुख आदि की वर्षा करनेवाला है। (सः त्वम्) वह आप (वृषा इत्) बादल ही (असि) हो ॥२॥ इस मन्त्र में सोमपदवाच्य परमेश्वर आदि में बादल का आरोप होने से रूपकालङ्कार है। ‘वृष्ण, वृष्ण’ में छेकानुप्रास, ‘वृषा, वृषा’ में लाटानुप्रास और ‘वृष्, वृष्, वृषा, वृषा, वृष, वृषे’ में वृत्त्यनुप्रास है ॥२॥
Essence
जगदीश्वर, राजा और आचार्य ये तीनों ही मनुष्यों को ऐहिक तथा पारलौकिक उन्नति प्राप्त कराने में सहायक होते हैं ॥२॥
Subject
अगले मन्त्र में पुनः परमात्मा, आचार्य और राजा की स्तुति है।