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Samveda Mantra 774

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- प्रजापतिर्वैश्वामित्रो वाच्यो वा Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
प्र꣡ सु꣢न्वा꣣ना꣡यान्ध꣢꣯सो꣣ म꣢र्तो꣣ न꣡ व꣢ष्ट꣣ तद्वचः꣢꣯ । अ꣢प꣣ श्वा꣡न꣢मरा꣣ध꣡सं꣢ ह꣣ता꣢ म꣣खं न भृग꣢꣯वः ॥७७४॥

प्र꣢ । सु꣣न्वाना꣡य꣢ । अ꣡न्ध꣢꣯सः । म꣡र्तः꣢꣯ । न । व꣣ष्ट । त꣢त् । व꣡चः꣢꣯ । अ꣡प꣢꣯ । श्वा꣡न꣢꣯म् । अ꣣राध꣡स꣢म् । अ꣣ । राध꣡स꣢म् । ह꣣त꣢ । म꣣ख꣢म् । न । भृ꣡ग꣢꣯वः ॥७७४॥

Mantra without Swara
प्र सुन्वानायान्धसो मर्तो न वष्ट तद्वचः । अप श्वानमराधसं हता मखं न भृगवः ॥

प्र । सुन्वानाय । अन्धसः । मर्तः । न । वष्ट । तत् । वचः । अप । श्वानम् । अराधसम् । अ । राधसम् । हत । मखम् । न । भृगवः ॥७७४॥

Samveda - Mantra Number : 774
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 6;

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Meaning
(अन्धसः) अन्नादि भोज्य पदार्थों को (सुन्वानाय) उत्पन्न करनेवाले जगदीश्वर के लिए (मर्तः न) उपासक मनुष्य के समान, तुम (तत्) उस स्तुति-रूप (वचः) वचन को बोलने की (वष्ट) कामना करो। और, (अराधसम्) भक्ति न करनेवाले (श्वानम्) कुत्ते की वृत्तिवाले अर्थात् सांसारिक पदार्थों का लोभ करनेवाले मनुष्य को (अप हत) दूर कर दो, किस प्रकार? (भृगवः) तपस्वी महर्षि जन (मखं न) जैसे मन की चञ्चलता को दूर करते हैं ॥३॥ इस मन्त्र में दो उपमाओं की संसृष्टि है ॥३॥
Essence
परमेश्वर की भक्ति करनेवाले लोगों को चाहिए कि वे भक्ति न करनेवाले, सांसारिक भोगों के लोभियों की सङ्गति न करें ॥३॥ इस खण्ड में विद्वान् आचार्य, उससे मिलनेवाले भौतिक तथा आध्यात्मिक ज्ञानरस, परमात्मा और उससे मिलनेवाले आनन्द-रस का वर्णन होने से इस खण्ड की पूर्व खण्ड के साथ सङ्गति है ॥ द्वितीय अध्याय का षष्ठ खण्ड समाप्त ॥ द्वितीय अध्याय समाप्त ॥ प्रथम प्रपाठक का द्वितीय अर्ध समाप्त ॥
Subject
तृतीय ऋचा पूर्वार्चिक में क्रमाङ्क ५५३ पर ‘कैसा मनुष्य समाज से बहिष्कृत करने योग्य है’ इस विषय में व्याख्यात हो चुकी है। यहाँ अन्य प्रकार से व्याख्या की जा रही है।

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