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Samveda Mantra 753

1875 Mantra
Devata- अश्विनौ Rishi- वसिष्ठो मैत्रावरुणिः Chhand- प्रगाथः(विषमा बृहती, समा सतोबृहती) Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
इ꣣मा꣡ उ꣢ वां꣣ दि꣡वि꣢ष्टय उ꣣स्रा꣡ ह꣢वन्ते अश्विना । अ꣣यं꣡ वा꣢म꣣ह्वे꣡ऽव꣢से शचीवसू꣣ वि꣡शं꣢विश꣣ꣳ हि꣡ गच्छ꣢꣯थः ॥७५३॥

इ꣣माः꣢ । उ꣣ । वाम् । दि꣡वि꣢꣯ष्टयः । उ꣣स्रा꣢ । उ꣣ । स्रा꣢ । ह꣣वन्ते । अश्विना । अय꣢म् । वा꣣म् । अह्वे । अ꣡व꣢꣯से । श꣣चीवसू । शची । वसूइ꣡ति꣢ । वि꣡शं꣢꣯विशम् । वि꣡श꣢꣯म् । वि꣣शम् । हि꣢ । ग꣡च्छ꣢꣯थः ॥७५३॥

Mantra without Swara
इमा उ वां दिविष्टय उस्रा हवन्ते अश्विना । अयं वामह्वेऽवसे शचीवसू विशंविशꣳ हि गच्छथः ॥

इमाः । उ । वाम् । दिविष्टयः । उस्रा । उ । स्रा । हवन्ते । अश्विना । अयम् । वाम् । अह्वे । अवसे । शचीवसू । शची । वसूइति । विशंविशम् । विशम् । विशम् । हि । गच्छथः ॥७५३॥

Samveda - Mantra Number : 753
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 4;

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Meaning
हे (अश्विना) ज्ञान एवं रक्षा से व्याप्त होनेवाले ब्राह्मण और क्षत्रियो ! (इमाः उ) ये (दिविष्टयः) यश के प्रकाश की इच्छुक (उस्राः) प्रजाएँ (वाम्) तुम निवासकों को (हवन्ते) पुकार रही हैं। हे (शचीवसू) कर्म-धन और प्रज्ञा-धन के धनियो ! (अयम्) यह मैं भी (अवसे) रक्षा के लिए (वाम्) तुम्हें (अह्वे) पुकारता हूँ, (हि) क्योंकि, तुम (विशं विशम्) प्रत्येक प्रजा के पास (गच्छथः) पहुँचा करते हो ॥१॥
Essence
जहाँ ब्रह्म और क्षत्र एक साथ मिलकर रहते हैं, उस राष्ट्र को मैं पुण्यवान् समझता हूँ (य० २०।२५)। इस वेदोक्ति के अनुसार जो ब्राह्मण और क्षत्रिय राष्ट्र को सौभाग्यशाली बनाने के योग्य होते हैं, उनका संरक्षण सब प्रजाओं को प्राप्त करना चाहिए ॥१॥
Subject
‘अश्विनौ’ देवतावाली प्रथम ऋचा पूर्वार्चिक में क्रमाङ्क ३०४ पर परमात्मा-जीवात्मा और अध्यापक-उपदेशक के पक्ष में व्याख्यात हो चुकी है। यहाँ राष्ट्र की उन्नति के लिए ब्राह्मण-क्षत्रियों का आह्वान किया गया है।

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