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Samveda Mantra 751

1875 Mantra
Devata- उषाः Rishi- वसिष्ठो मैत्रावरुणिः Chhand- प्रगाथः(विषमा बृहती, समा सतोबृहती) Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
प्र꣡त्यु꣢ अदर्श्याय꣣त्यू꣢३꣱च्छ꣡न्ती꣢ दुहि꣣ता꣢ दि꣣वः꣢ । अ꣡पो꣢ म꣣ही꣡ वृ꣢णुते꣣ च꣡क्षु꣢षा꣣ त꣢मो꣣ ज्यो꣡ति꣢ष्कृणोति सू꣣न꣡री꣢ ॥७५१॥

प्र꣡ति꣢꣯ । उ꣣ । अदर्शि । आयती꣢ । आ꣣ । यती꣢ । उ꣣च्छ꣡न्ती꣢ । दु꣣हिता꣢ । दि꣣वः꣢ । अ꣡प꣢꣯ । उ꣣ । मही꣢ । वृ꣣णुते । च꣡क्षुषा꣢꣯ । त꣡मः꣢꣯ । ज्यो꣡तिः꣢꣯ । कृ꣣णोति । सून꣡री꣢ । सु꣣ । न꣡री꣢꣯ ॥७५१॥

Mantra without Swara
प्रत्यु अदर्श्यायत्यू३च्छन्ती दुहिता दिवः । अपो मही वृणुते चक्षुषा तमो ज्योतिष्कृणोति सूनरी ॥

प्रति । उ । अदर्शि । आयती । आ । यती । उच्छन्ती । दुहिता । दिवः । अप । उ । मही । वृणुते । चक्षुषा । तमः । ज्योतिः । कृणोति । सूनरी । सु । नरी ॥७५१॥

Samveda - Mantra Number : 751
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 4;

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1 Bhashyas
Meaning
(आयती) आती हुई, (उच्छन्ती) हृदय-प्राङ्गण में उदित होती हुई, (दिवः दुहिता) तेजस्वी परमात्मा की पुत्री के समान विद्यमान अध्यात्मप्रभा (चक्षुषा) अपने दिव्य प्रकाश से (तमः) मोहरूप अन्धकार को (अप उ वृणुते) दूर कर रही है। (सूनरी) उत्कृष्ट नेतृत्व करनेवाली यह अध्यात्मप्रभारूप उषा (ज्योतिः) विवेकख्यातिरूप ज्योति को (कृणोति) उत्पन्न कर रही है ॥१॥
Essence
परमात्मा की उपासना से हृदय में प्रकट होती हुई दिव्यप्रभा समस्त तामसिकता के जाल को विच्छिन्न करके अन्तःकरण को निर्मल बना देती है ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा पूर्वार्चिक में क्रमाङ्क ३०३ पर प्राकृतिक उषा के पक्ष में व्याख्यात की जा चुकी है। यहाँ आध्यात्मिक उषा का वर्णन करते हैं।