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Samveda Mantra 747

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- नारदः काण्वः Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
स꣡ प्र꣢थ꣣मे꣡ व्यो꣢मनि दे꣣वा꣢ना꣣ꣳ स꣡द꣢ने वृ꣣धः꣢ । सु꣣पारः꣢ सु꣣श्र꣡व꣢स्तमः꣣ स꣡म꣢प्सु꣣जि꣢त् ॥७४७॥

सः । प्र꣣थमे꣢ । व्यो꣡म꣢नि । वि । ओ꣣मनि । दे꣣वा꣡ना꣢म् । स꣡द꣢꣯ने । वृ꣢धः꣡ । सु꣣पा꣢रः । सु꣣ । पारः꣡ । सु꣣श्र꣡व꣢स्तमः । सु꣣ । श्र꣡व꣢꣯स्तमः । सम् । अ꣣प्सुजि꣣त् । अ꣣प्सु । जि꣢त् ॥७४७॥

Mantra without Swara
स प्रथमे व्योमनि देवानाꣳ सदने वृधः । सुपारः सुश्रवस्तमः समप्सुजित् ॥

सः । प्रथमे । व्योमनि । वि । ओमनि । देवानाम् । सदने । वृधः । सुपारः । सु । पारः । सुश्रवस्तमः । सु । श्रवस्तमः । सम् । अप्सुजित् । अप्सु । जित् ॥७४७॥

Samveda - Mantra Number : 747
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 3;

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1 Bhashyas
Meaning
(सः) वह विद्याप्रदाता आचार्य (प्रथमे) श्रेष्ठ (व्योमनि) आकाश के समान व्यापक ओंकारपदवाच्य ब्रह्म में स्थित हुआ (देवानां सदने) विद्वानों के सदन गुरुकुल में रहता हुआ (वृधः) छात्रों की उन्नति करानेवाला, (सुपारः) विद्या के समुद्र से पार करनेवाला, (सुश्रवस्तमः) अत्यन्त यशस्वी, (अप्सुजित्) व्याप्त विद्याओं में तथा शुभकर्मों में अन्यों को जीत लेनेवाला अर्थात् अन्यों की अपेक्षा अधिक पारंगत है। मैं (सम्) उसकी भली-भाँति स्तुति करता हूँ ॥२॥
Essence
सुयोग्य, विद्या के सागर, कर्मयोगी आचार्य को पाकर विद्यार्थी भी वैसे ही बनते हैं ॥२॥
Subject
आगे फिर उसी विषय का वर्णन है।