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Samveda Mantra 742

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
स꣡ घा꣢ नो꣣ यो꣢ग꣣ आ꣡ भु꣢व꣣त्स꣢ रा꣣ये꣡ स पुर꣢꣯न्ध्या । ग꣢म꣣द्वा꣡जे꣢भि꣣रा꣡ स नः꣢꣯ ॥७४२॥

सः । घ꣣ । नः । यो꣡गे꣢꣯ । आ । भु꣣वत् । सः꣢ । रा꣣ये꣢ । सः । पु꣡र꣢꣯न्ध्या । पु꣡र꣢꣯म् । ध्या꣣ । ग꣡म꣢꣯त् । वा꣡जे꣢꣯भिः । आ । सः । नः꣣ ॥७४२॥

Mantra without Swara
स घा नो योग आ भुवत्स राये स पुरन्ध्या । गमद्वाजेभिरा स नः ॥

सः । घ । नः । योगे । आ । भुवत् । सः । राये । सः । पुरन्ध्या । पुरम् । ध्या । गमत् । वाजेभिः । आ । सः । नः ॥७४२॥

Samveda - Mantra Number : 742
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 3;

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1 Bhashyas
Meaning
(सः) वह प्रसिद्ध (इन्द्र) परमात्मा (नः) हमारे (योगे) अष्टाङ्गयोग की सिद्धि में (आ भुवत्) सहायक होवे। (सः) वह (राये) अणिमा, लघिमा, महिमा आदि ऐश्वर्यों की प्राप्ति के लिए, हमारा सहायक होवे। (सः) वह (पुरन्ध्या) पालन करनेवाली बुद्धि से हमें संयुक्त करे। (सः) वह (वाजेभिः) अध्यात्म-बलों के साथ (नः) हमारे पास (आगमत्) आये ॥३॥
Essence
योगसिद्धि के मार्ग में जो विघ्न उपस्थित होते हैं, वे परमात्मा की सहायता से दूर किये जा सकते हैं ॥३॥
Subject
आगे फिर उसी विषय का वर्णन है।