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Samveda Mantra 741

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
पु꣣रूत꣡मं꣢ पु꣣रूणा꣡मीशा꣢꣯नं꣣ वा꣡र्या꣢णाम् । इ꣢न्द्र꣣ꣳ सो꣢मे꣣ स꣡चा꣢ सु꣣ते꣢ ॥७४१॥

पु꣣रूत꣡म꣢म् । पु꣣रूणा꣢म् । ई꣡शा꣢꣯नम् । वा꣡र्या꣢꣯णाम् । इ꣡न्द्र꣢꣯म् । सो꣡मे꣢꣯ । स꣡चा꣢꣯ । सु꣣ते꣢ ॥७४१॥

Mantra without Swara
पुरूतमं पुरूणामीशानं वार्याणाम् । इन्द्रꣳ सोमे सचा सुते ॥

पुरूतमम् । पुरूणाम् । ईशानम् । वार्याणाम् । इन्द्रम् । सोमे । सचा । सुते ॥७४१॥

Samveda - Mantra Number : 741
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 3;

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Meaning
हे साथियो ! (पुरूणाम्) पूर्णों एवं पालनकर्त्ताओं में (पुरूतमम्) पूर्णतम और सर्वाधिक पालक, (वार्याणाम्) वरणीय गुणों के (ईशानम्) अधीश्वर (इन्द्रम्) परमात्मा के प्रति (सुते) श्रद्धारस के तैयार हो जाने पर (सचा) साथ मिलकर (प्र गायत) स्तुति-गीत गाओ। [यहाँ ‘प्रगायत’ शब्द पूर्व मन्त्र से आया है] ॥२॥
Essence
जो स्वयं पूर्ण और अन्यों को पूर्ण करनेवाला, समस्त गुणों से विभूषित परमेश्वर है, उसकी सबको मिलकर श्रद्धा के साथ उपासना करनी चाहिए ॥२॥
Subject
आत्मा को उद्बोधन देने के अनन्तर अब परमात्मा के विषय में कहते हैं।

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