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Samveda Mantra 731

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- त्रिशोकः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ꣣भि꣡ त्वा꣢ वृषभा सु꣣ते꣢ सु꣣त꣡ꣳ सृ꣢जामि पी꣣त꣡ये꣢ । तृ꣣म्पा꣡ व्य꣢श्नुही꣣ म꣡द꣢म् ॥७३१॥

अ꣣भि꣢ । त्वा꣣ । वृषभ । सुते꣢ । सु꣣त꣢म् । सृ꣣जामि । पीत꣡ये꣢ । तृ꣣म्प꣢ । वि । अ꣣श्नुहि । म꣡दम्꣢꣯ ॥७३१॥

Mantra without Swara
अभि त्वा वृषभा सुते सुतꣳ सृजामि पीतये । तृम्पा व्यश्नुही मदम् ॥

अभि । त्वा । वृषभ । सुते । सुतम् । सृजामि । पीतये । तृम्प । वि । अश्नुहि । मदम् ॥७३१॥

Samveda - Mantra Number : 731
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 2;

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1 Bhashyas
Meaning
हे (वृषभ) शक्तिशाली मेरे अन्तरात्मन् ! (सुते) इस उपासना-यज्ञ के प्रवृत्त होने पर (त्वा अभि) तेरे प्रति (पीतये) पान करने के लिए (सुतम्) श्रद्धा-रस (सृजामि) उत्पन्न कर रहा हूँ। इससे तू (तृम्प)तृप्त हो, (मदम्) हर्ष को (व्यश्नुहि) प्राप्त कर ॥१॥
Essence
सबको चाहिए कि अपने अन्तरात्मा को उद्बोधन देकर उसके अन्दर श्रद्धा-रस का सञ्चार करें ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा पूर्वार्चिक में क्रमाङ्क १६१ पर परमात्मा तथा गुरु-शिष्य के विषय में व्याख्यात हो चुकी है। यहाँ अपने अन्तरात्मा को सम्बोधन है।