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Samveda Mantra 726

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- इरिम्बिठिः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
शा꣡चि꣢गो꣣ शा꣡चि꣢पूजना꣣य꣡ꣳ रणा꣢꣯य ते सु꣣तः꣢ । आ꣡ख꣢ण्डल꣣ प्र꣡ हू꣢यसे ॥७२६॥

शा꣡चि꣢꣯गो । शा꣡चि꣢꣯ । गो꣣ । शा꣡चि꣢꣯पूजन । शा꣡चि꣢꣯ । पू꣣जन । अय꣢म् । र꣡णा꣢꣯य । ते꣣ । सुतः꣢ । आ꣡ख꣢꣯ण्डल । प्र । हू꣡यसे ॥७२६॥

Mantra without Swara
शाचिगो शाचिपूजनायꣳ रणाय ते सुतः । आखण्डल प्र हूयसे ॥

शाचिगो । शाचि । गो । शाचिपूजन । शाचि । पूजन । अयम् । रणाय । ते । सुतः । आखण्डल । प्र । हूयसे ॥७२६॥

Samveda - Mantra Number : 726
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 2;

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1 Bhashyas
Meaning
हे (शाचिगो) जिसकी वाणियाँ ज्ञान और कर्म का उपदेश करनेवाली हैं, ऐसे जगदीश्वर ! हे (शाचिपूजन) ज्ञानी पुरुषार्थियों से पूजे जानेवाले परमात्मन् ! (अयम्) यह भक्ति-रस (ते) आपके (रणाय) रमने के लिए (सुतः) हमारे द्वारा उत्पन्न किया गया है। हे (आखण्डल) दुःख, दुर्गुण, दुर्व्यसन आदि को खण्ड-खण्ड करनेवाले देव ! आप उस भक्ति-रस का पान करने के लिए (प्रहूयसे) हमारे द्वारा चाव से बुलाए जा रहे हो ॥२॥
Essence
ज्ञान और पुरुषार्थपूर्वक भक्तिभाव से आराधना किया हुआ परमेश्वर उपासकों के दुःख, दारिद्र्य आदि को खण्डित करके उन्हें ऋद्धि-सिद्धि प्रदान करके सुखी करता है ॥२॥
Subject
गुरु से अध्यात्मविद्या ग्रहण कर चुकने के पश्चात् शिष्य परमेश्वर को पुकार रहे हैं।