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Samveda Mantra 722

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- श्रुतकक्षः सुकक्षो वा आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
इ꣡न्द्रा꣢य꣣ म꣡द्व꣢ने सु꣣तं꣡ परि꣢꣯ ष्टोभन्तु नो꣣ गि꣡रः꣢ । अ꣣र्क꣡म꣢र्च्चन्तु का꣣र꣡वः꣢ ॥७२२॥

इ꣡न्द्रा꣢꣯य । म꣡द्व꣢꣯ने । सु꣣त꣢म् । प꣡रि꣢꣯ । स्तो꣣भन्तु । नः । गि꣡रः꣢꣯ । अ꣣र्क꣢म् । अ꣣र्चन्तु । कार꣡वः꣢ ॥७२२॥

Mantra without Swara
इन्द्राय मद्वने सुतं परि ष्टोभन्तु नो गिरः । अर्कमर्च्चन्तु कारवः ॥

इन्द्राय । मद्वने । सुतम् । परि । स्तोभन्तु । नः । गिरः । अर्कम् । अर्चन्तु । कारवः ॥७२२॥

Samveda - Mantra Number : 722
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 1;

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Meaning
(मद्वने) ब्रह्मविद्या में आनन्द अनुभव करनेवाले (इन्द्राय)शिष्यों के आत्मा के लिए (नः) हमारी (गिरः) वाणियाँ (सुतम्) अभिषुत ज्ञान को (परिष्टोभन्तु) परिधारित करें, देवें, जिससे (कारवः) स्तुतिकर्ता होते हुए वे (अर्कम्) पूजनीय परमात्मदेव की (अर्चन्तु) पूजा किया करें ॥१॥
Essence
शिष्यों को चाहिए कि गुरुओं से लौकिक ज्ञान और ब्रह्मज्ञान प्राप्त करके गुरुजनों द्वारा उपदेश किये गये मार्ग से परमात्मा का ध्यान करते हुए उसका साक्षात्कार करें ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा की व्याख्या पूर्वार्चिक में क्रमाङ्क १५८ पर परमात्मोपासना के विषय में की गयी है। यहाँ गुरुजन कह रहे हैं।

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