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Samveda Mantra 72

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- वसिष्ठो मैत्रावरुणिः Chhand- त्रिपाद विराड् गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
अ꣣ग्निं꣢꣫ नरो꣣ दी꣡धि꣢तिभिर꣣र꣢ण्यो꣣र्ह꣡स्त꣢च्युतं जनयत प्रश꣣स्त꣢म् । दूरे꣣दृ꣡शं꣢ गृ꣣ह꣡प꣢तिमथ꣣व्यु꣢म् ॥७२॥

अ꣣ग्नि꣢म् । न꣡रः꣢꣯ । दी꣡धि꣢꣯तिभिः । अ꣣र꣡ण्योः꣢ । ह꣡स्त꣢꣯च्युतम् । ह꣡स्त꣢꣯ । च्यु꣣तम् । जनयत । प्रशस्त꣢म् । प्र꣣ । श꣢स्तम् । दू꣣रेदृ꣡श꣢म् । दू꣣रे । दृ꣡ष꣢꣯म् । गृ꣣ह꣡ प꣢तिम् । गृ꣣ह꣢ । प꣣तिम् । अथव्यु꣢म् । अ꣣ । थव्यु꣢म् ॥७२॥

Mantra without Swara
अग्निं नरो दीधितिभिररण्योर्हस्तच्युतं जनयत प्रशस्तम् । दूरेदृशं गृहपतिमथव्युम् ॥

अग्निम् । नरः । दीधितिभिः । अरण्योः । हस्तच्युतम् । हस्त । च्युतम् । जनयत । प्रशस्तम् । प्र । शस्तम् । दूरेदृशम् । दूरे । दृषम् । गृह पतिम् । गृह । पतिम् । अथव्युम् । अ । थव्युम् ॥७२॥

Samveda - Mantra Number : 72
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 7;

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1 Bhashyas
Meaning
(नरः) आप उपासक लोग (हस्तच्युतम्) हाथ, पैर, आँख, कान आदि से रहित, (प्रशस्तम्) प्रशस्तियुक्त, (दूरेदृशम्) दूरदर्शी, (गृहपतिम्) ब्रह्माण्ड-रूप अथवा शरीर-रूप घर के पालनकर्ता, (अथव्युम्) अचल, स्थिरमति (अग्निम्) परमात्मा-रूप अग्नि को (दीधितिभिः) ध्यानक्रिया रूप अंगुलियों से (अरण्योः) मन और आत्मा रूप अरणियों के मध्य में (जनयत) प्रकट करो ॥१०॥ इस मन्त्र में श्लेष से यज्ञाग्नि के पक्ष में भी अर्थयोजना करनी चाहिए ॥१०॥
Essence
अरणियों को रगड़कर जैसे यज्ञवेदि में यज्ञाग्नि को प्रदीप्त करते हैं, वैसे ही ध्यानरूप रगड़ से परमात्मा को हृदय में प्रकाशित करना चाहिए ॥१०॥ इस दशति में परमेश्वर का माहात्म्य वर्णित होने से, और उसकी पूजा के लिए, उसकी ज्योति का साक्षात्कार करने के लिए तथा ध्यान-रूप मन्थन-क्रियाओं से उसे प्रकाशित करने के लिए मनुष्यों को प्रेरित किये जाने से इस दशति के विषय की पूर्व दशति के विषय के साथ संगति है ॥ प्रथम प्रपाठक में द्वितीय अर्ध की द्वितीय दशति समाप्त ॥ प्रथम अध्याय में सप्तम खण्ड समाप्त ॥
Subject
अगले मन्त्र में यह कहा गया है कि परमात्मा रूप अग्नि को सब मनुष्य हृदयों में प्रदीप्त करें।