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Samveda Mantra 719

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- मेधातिथिः काण्वः प्रियमेधश्चाङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
व꣣य꣡मु꣢ त्वा त꣣दि꣡द꣢र्था꣣ इ꣡न्द्र꣢ त्वा꣣य꣢न्तः꣣ स꣡खा꣢यः । क꣡ण्वा꣢ उ꣣क्थे꣡भि꣢र्जरन्ते ॥७१९॥

व꣣य꣢म् । उ꣣ । त्वा । तदि꣡द꣢र्थाः । त꣣दि꣢त् । अर्थाः । इ꣡न्द्र꣢꣯ । त्वा꣣य꣡न्तः꣢ । स꣡खा꣢꣯यः । स । खा꣣यः । क꣡ण्वाः꣢꣯ । उ꣣क्थे꣡भिः꣢ । ज꣣रन्ते ॥७१९॥

Mantra without Swara
वयमु त्वा तदिदर्था इन्द्र त्वायन्तः सखायः । कण्वा उक्थेभिर्जरन्ते ॥

वयम् । उ । त्वा । तदिदर्थाः । तदित् । अर्थाः । इन्द्र । त्वायन्तः । सखायः । स । खायः । कण्वाः । उक्थेभिः । जरन्ते ॥७१९॥

Samveda - Mantra Number : 719
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 1;

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1 Bhashyas
Meaning
हे आचार्यप्रवर ! (तदिदर्थाः) वह लौकिक विद्या तथा ब्रह्मविद्या का अध्ययन ही जिनका उद्देश्य है, ऐसे (वयम्) हम विद्यार्थी (त्वा) आपके समीप आते हैं। हे (इन्द्र) विद्याओं के अधिपति ! (सखायः) सहाध्यायी हम (त्वायन्तः) आपको चाहते हैं। सभी (कण्वाः) मेधावी विद्यार्थी (उक्थेभिः) स्तोत्रों से आपकी (जरन्ते) स्तुति करते हैं ॥१॥
Essence
शिष्यों को चाहिये कि गुरुओं के प्रति सदा ही विनय का व्यवहार करें, नित्य उनकी सेवा करें। कहा भी है—पढ़ाए हुए जो विप्र छात्र मन-वाणी-कर्म से गुरु का आदर नहीं करते, वे गुरु के कृपापात्र नहीं बनते और न ही पढ़ी हुई विद्या उनकी रक्षा करती है (निरुक्त २।४) ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा पूर्वार्चिक में क्रमाङ्क १५७ पर परमात्मोपासना के विषय में व्याख्यात हो चुकी है। यहाँ शिष्यगण आचार्य को कह रहे हैं।