Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Samveda Mantra 718

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वसिष्ठो मैत्रावरुणिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
त्वं꣡ न इ꣢न्द्र वाज꣣यु꣢꣫स्त्वं ग꣣व्युः꣡ श꣢तक्रतो । त्व꣡ꣳ हि꣢रण्य꣣यु꣡र्व꣢सो ॥७१८॥

त्व꣢म् । नः꣣ । इन्द्रः । वाजयुः꣢ । त्वम् । ग꣣व्युः꣢ । श꣣तक्रतो । शत । क्रतो । त्व꣢म् । हि꣣रण्ययुः꣢ । व꣣सो ॥७१८॥

Mantra without Swara
त्वं न इन्द्र वाजयुस्त्वं गव्युः शतक्रतो । त्वꣳ हिरण्ययुर्वसो ॥

त्वम् । नः । इन्द्रः । वाजयुः । त्वम् । गव्युः । शतक्रतो । शत । क्रतो । त्वम् । हिरण्ययुः । वसो ॥७१८॥

Samveda - Mantra Number : 718
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 1;

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) सर्वान्तर्यामी जगदीश्वर ! (त्वम्) आप (नः) हमारे लिये (वाजयुः) अन्न, धन, बल, विज्ञान आदि प्रदान करने के इच्छुक होवो। हे (शतक्रतो) अनन्त ज्ञान तथा अनन्त कर्मोंवाले जगदीश्वर ! (त्वम्) आप (गव्युः) हमें गाय प्रदान करने के इच्छुक होवो। हे (वसो) निवास देनेवाले जगदीश्वर ! (त्वम्) आप (हिरण्ययुः) हमें सुवर्ण और ज्योति प्रदान करने के इच्छुक होवो ॥३॥
Essence
परमात्मा की उपासना करके उसकी कृपा से हम अन्न, धन, गाय, बल, वेग, विज्ञान, श्रेष्ठ संकल्प, श्रेष्ठ विचार, श्रेष्ठ विवेक, श्रेष्ठ प्रकाश, श्रेष्ठ कर्म, श्रेष्ठ गुण तथा दुःखों से मोक्ष आदि सभी भौतिक और दिव्य सम्पदा पाने योग्य होवें ॥३॥
Subject
अगले मन्त्र में जगदीश्वर की स्तुति है।