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Samveda Mantra 711

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- नृमेध आङ्गिरसः Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
वा꣡र्ण त्वा꣢꣯ य꣣व्या꣢भि꣣र्व꣡र्ध꣢न्ति शूर꣣ ब्र꣡ह्मा꣢णि । वा꣣वृध्वा꣡ꣳसं꣢ चिदद्रिवो दि꣣वे꣡दि꣢वे ॥७११॥

वाः । न । त्वा꣣ । यव्या꣡भिः꣢ । व꣡र्द्ध꣢꣯न्ति । शू꣣र । ब्र꣡ह्मा꣢꣯णि । वा꣣वृध्वा꣡ꣳस꣢म् । चि꣣त् । अद्रिवः । अ । द्रिवः । दि꣡वेदि꣢वे । दि꣣वे꣢ । दि꣣वे ॥७११॥

Mantra without Swara
वार्ण त्वा यव्याभिर्वर्धन्ति शूर ब्रह्माणि । वावृध्वाꣳसं चिदद्रिवो दिवेदिवे ॥

वाः । न । त्वा । यव्याभिः । वर्द्धन्ति । शूर । ब्रह्माणि । वावृध्वाꣳसम् । चित् । अद्रिवः । अ । द्रिवः । दिवेदिवे । दिवे । दिवे ॥७११॥

Samveda - Mantra Number : 711
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 6;

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1 Bhashyas
Meaning
हे (शूर) शूरवीर, (अद्रिवः) किसी से विदारण न किये जा सकनेवाले अजर-अमर इन्द्र प्रभु ! (यव्याभिः) नहरों द्वारा जल लाकर (वाः न) जैसे सरोवर आदि में लोग जल के परिमाण को बढ़ाते रहते हैं, वैसे ही (वावृध्वांसं चित्) पहले से बढ़े हुए भी (त्वा) तुझे (ब्रह्माणि) उपासक के स्तोत्र (वर्धन्ति) अपने हृदय में बढ़ाते हैं या समाज में प्रचारित करते हैं ॥२॥ ‘जो पहले से ही बढ़ा हुआ है, उसे भी बढ़ाते हैं’ इसमें विरोधालङ्कार है। बढ़ाने से स्मरण तथा प्रचार अभिप्रेत होने पर विरोध का परिहार हो जाता है ॥२॥
Essence
सर्वान्तर्यामी ह्रासवृद्धिरहित भी परमेश्वर लोगों द्वारा भुला दिये जाने से और नास्तिकता का प्रचार हो जाने के कारण मानो ह्रास को प्राप्त हो जाता है। भक्तजनों को चाहिए कि उसके स्तोत्रों का गान करके उसे बढ़ायें तथा उसका प्रचार करें ॥२॥
Subject
अगले मन्त्र में परमात्मा का विषय है।