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Samveda Mantra 699

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- अन्धीगुः श्यावाश्विः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
तं꣢ दु꣣रो꣡ष꣢म꣣भी꣢꣫ नरः꣣ सो꣡मं꣢ वि꣣श्वा꣡च्या꣢ धि꣣या꣢ । य꣣ज्ञा꣡य꣢ स꣣न्त्व꣡द्र꣢यः ॥६९९॥

तम् । दु꣣रो꣡ष꣢म् । अ꣣भि꣢ । न꣡रः꣢꣯ । सो꣡म꣢꣯म् । वि꣣श्वा꣡च्या꣢ । धि꣣या꣢ । य꣣ज्ञा꣡य꣢ । स꣣न्तु । अ꣡द्र꣢꣯यः । अ । द्र꣣यः ॥६९९॥

Mantra without Swara
तं दुरोषमभी नरः सोमं विश्वाच्या धिया । यज्ञाय सन्त्वद्रयः ॥

तम् । दुरोषम् । अभि । नरः । सोमम् । विश्वाच्या । धिया । यज्ञाय । सन्तु । अद्रयः । अ । द्रयः ॥६९९॥

Samveda - Mantra Number : 699
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 5;

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Meaning
(दुरोषम्) जलाये या सुखाये न जा सकने योग्य (तम्) उस पूर्ववर्णित (सोमम्) ज्ञान-कर्म-उपासनारूप सोमरस को (नरः) सज्जन लोग (विश्वाच्या) सब उत्कृष्ट विषयों के विवेचन में व्याप्त होनेवाली (धिया) बुद्धि से (अभि) अभिषुत करें, जिससे (अद्रयः) किसी भी आन्तरिक या बाह्य शत्रु से विदीर्ण न होनेवाले वे लोग (यज्ञाय) परमेश्वर की पूजा, विद्वानों के सत्कार, संगठन और परोपकार-रूप यज्ञ के लिए (सन्तु) होवें ॥३॥
Essence
श्रेष्ठज्ञान, सत्कर्म और परमेश्वर की उपासना को जो अपने जीवन में ग्रहण करते हैं वे सदा विजयी और यज्ञपरायण होते हैं ॥३॥
Subject
अगले मन्त्र में पुनः उसी विषय का वर्णन है।

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