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Samveda Mantra 697

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- अन्धीगुः श्यावाश्विः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
पु꣣रो꣡जि꣢ती वो꣣ अ꣡न्ध꣢सः सु꣣ता꣡य꣢ मादयि꣣त्न꣡वे꣢ । अ꣢प꣣ श्वा꣡न꣢ꣳ श्नथिष्टन꣣ स꣡खा꣢यो दीर्घजि꣣꣬ह्व्य꣢꣯म् ॥६९७॥

पु꣣रो꣡जि꣢ती । पु꣣रः꣢ । जि꣣ती । वः । अ꣡न्ध꣢꣯सः । सु꣣ता꣡य꣢ । मा꣣दयित्न꣡वे꣢ । अ꣡प꣢꣯ । श्वा꣡न꣢꣯म् । श्न꣣थिष्टन । श्नथिष्ट । न । स꣡खा꣢꣯यः । स । खा꣣यः । दी꣣र्घजि꣡ह्व्य꣣म् । दी꣣र्घ । जि꣡ह्व्य꣢꣯म् ॥६९७॥

Mantra without Swara
पुरोजिती वो अन्धसः सुताय मादयित्नवे । अप श्वानꣳ श्नथिष्टन सखायो दीर्घजिह्व्यम् ॥

पुरोजिती । पुरः । जिती । वः । अन्धसः । सुताय । मादयित्नवे । अप । श्वानम् । श्नथिष्टन । श्नथिष्ट । न । सखायः । स । खायः । दीर्घजिह्व्यम् । दीर्घ । जिह्व्यम् ॥६९७॥

Samveda - Mantra Number : 697
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 5;

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Meaning
हे (सखायः) मित्रो ! (वः) तुम (अन्धसः) ज्ञान-कर्म-उपासनारूप सोम को (पुरोजिती) आगे बढ़कर जीतने के लिए और उस सोम के (मादयित्नवे) आनन्दप्रदायक (सुताय) रस को प्राप्त करने के लिए (दीर्घजिह्व्यम्) लम्बी जीभवाले अर्थात् दूरस्थ विषयों के भी ग्रहण में समर्थ (श्वानम्) वेगवान् मन को (अपश्नथिष्टन) प्रवृत्त करो ॥१॥
Essence
ज्ञान, कर्म और उपासना में मन को प्रवृत्त करके उससे मिलनेवाला आनन्द सबको प्राप्त करना चाहिए ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा की पूर्वार्चिक में क्रमाङ्क ५४५ पर ब्रह्मानन्द के विषय में व्याख्या हो चुकी है। यहाँ प्रकरणप्राप्त ज्ञान कर्म उपासना का विषय है।

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