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Samveda Mantra 693

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- गौरिवीतिः शाक्त्यः Chhand- काकुभः प्रगाथः (विषमा ककुप्, समा सतोबृहती) Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
य꣡स्य꣢ ते पी꣣त्वा꣡ वृ꣢ष꣣भो꣡ वृ꣢षा꣣य꣢ते꣣ऽस्य꣢ पी꣣त्वा꣢ स्व꣣र्वि꣡दः꣢ । स꣢ सु꣣प्र꣡के꣢तो अ꣣꣬भ्य꣢꣯क्रमी꣣दि꣢꣫षोऽच्छा꣣ वा꣢जं꣣ नै꣡त꣢शः ॥६९३॥

य꣡स्य꣢꣯ । ते꣣ । पीत्वा꣢ । वृ꣣षभः꣢ । वृ꣣षाय꣡ते꣢ । अ꣣स्य꣢ । पी꣣त्वा꣢ । स्व꣣र्वि꣡दः꣢ । स्वः꣣ । वि꣡दः꣢꣯ । सः । सु꣣प्र꣡के꣢तः । सु꣣ । प्र꣡के꣢꣯तः । अ꣣भि꣢ । अ꣣क्रमीत् । इ꣡षः । अ꣡च्छ꣢꣯ । वा꣡ज꣢꣯म् । न । ए꣡त꣢꣯शः ॥६९३॥

Mantra without Swara
यस्य ते पीत्वा वृषभो वृषायतेऽस्य पीत्वा स्वर्विदः । स सुप्रकेतो अभ्यक्रमीदिषोऽच्छा वाजं नैतशः ॥

यस्य । ते । पीत्वा । वृषभः । वृषायते । अस्य । पीत्वा । स्वर्विदः । स्वः । विदः । सः । सुप्रकेतः । सु । प्रकेतः । अभि । अक्रमीत् । इषः । अच्छ । वाजम् । न । एतशः ॥६९३॥

Samveda - Mantra Number : 693
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 5;

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1 Bhashyas
Meaning
हे पवमान सोम ! हे पवित्रतादायक रसागार परमात्मन् ! (यस्य ते) जिन आपके शान्तिरस का (पीत्वा) पान करके (वृषभः) भगवान् को भक्तिरस से सींचनेवाला उपासक (वृषायते) वर्षाकारी बादल के समान आचरण करने लगता है, अर्थात् जैसे बादल गर्मी से झुलसते हुओं पर शान्तिदायक जल बरसाता है, वैसे ही वह अशान्ति से झुलसते हुओं पर शान्तिरस बरसाता है, (अस्य) उन आपके शान्तिरस को (पीत्वा) पीकर, लोग (स्वर्विदः) मोक्षसुख के प्राप्तकर्ता हो जाते हैं। (सुप्रकेतः) उत्कृष्ट ज्ञानी (सः) वह आपका उपासक (इषः अभि) इच्छासिद्धियों की ओर (अक्रमीत्) कदम बढ़ाता चलता है, (न) जैसे (एतशः) घोड़ा (वाजम् अच्छ) संग्राम की ओर पग बढाता है ॥२॥ इस मन्त्र में ‘वृषभो वृषायते’ में मम्मट के मत से वाचकलुप्तोपमा तथा दर्पणकार के मत से धर्मलुप्तोपमा है। ‘वृष, वृषा’ में छेकानुप्रास है। उत्तरार्ध में पूर्णोपमा है ॥२॥
Essence
परमेश्वर की उपासना से भगवान् का भक्त जैसे स्वयं शान्ति प्राप्त करता है, वैसे ही अन्यों के लिए भी शान्ति बरसाता है और उसके सब धर्मानुकूल मनोरथ शीघ्र ही फल जाते हैं ॥२॥
Subject
अगले मन्त्र में परमात्मा के शान्तिरस का विषय वर्णित है।