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Samveda Mantra 692

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- गौरिवीतिः शाक्त्यः Chhand- काकुभः प्रगाथः (विषमा ककुप्, समा सतोबृहती) Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
प꣡व꣢स्व꣣ म꣡धु꣢मत्तम꣣ इ꣡न्द्रा꣢य सोम क्रतु꣣वि꣡त्त꣢मो꣣ म꣡दः꣢ । म꣡हि꣢ द्यु꣣क्ष꣡त꣢मो꣣ म꣡दः꣢ ॥६९२॥

प꣡वस्व꣢꣯ । म꣡धु꣢꣯मत्तमः । इ꣡न्द्रा꣢꣯य । सो꣣म । क्रतुवि꣡त्त꣢मः । क्र꣣तु । वि꣡त्त꣢꣯मः । म꣡दः꣢꣯ । म꣡हि꣢꣯ । द्यु꣣क्ष꣡त꣢मः । द्यु꣣ । क्ष꣡त꣢꣯मः । म꣡दः꣢꣯ ॥६९२॥

Mantra without Swara
पवस्व मधुमत्तम इन्द्राय सोम क्रतुवित्तमो मदः । महि द्युक्षतमो मदः ॥

पवस्व । मधुमत्तमः । इन्द्राय । सोम । क्रतुवित्तमः । क्रतु । वित्तमः । मदः । महि । द्युक्षतमः । द्यु । क्षतमः । मदः ॥६९२॥

Samveda - Mantra Number : 692
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 5;

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Meaning
हे (सोम) ब्रह्मज्ञान-रस ! (मधुमत्तमः) सबसे अधिक मधुर तू (पवस्व) हमें पवित्र कर। तेरा (मदः) आनन्द (इन्द्राय) मेरे अन्तरात्मा के लिए (क्रतुवित्तमः) प्रज्ञा तथा कर्म को अत्यधिक प्राप्त करानेवाला होता है। तेरा (मदः) आनन्द (महि) अत्यधिक (द्युक्षतमः) तेज को बसानेवाला होता है ॥१॥
Essence
आचार्य से ब्रह्मज्ञान प्राप्त करके ब्रह्म के गुण-कर्म-स्वभाव का ध्यान कर-करके अपने जीवन को पवित्र करना चाहिए ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा की पूर्वार्चिक में ५७८ क्रमाङ्क पर परमात्मा से प्राप्त होनेवाले आनन्दरस के विषय में व्याख्या की जा चुकी है। यहाँ आचार्य से प्राप्त होनेवाले ज्ञानरस का वर्णन है।