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Samveda Mantra 690

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- मधुच्छन्दा वैश्वामित्रः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
र꣣क्षोहा꣢ वि꣣श्व꣡च꣢र्षणिर꣣भि꣢꣫ योनि꣣म꣡यो꣢हते । द्रो꣡णे꣢ स꣣ध꣢स्थ꣣मा꣡स꣢दत् ॥६९०॥

र꣣क्षोहा꣢ । र꣣क्षः । हा꣢ । वि꣣श्व꣡च꣢र्षणिः । वि꣣श्व꣢ । च꣣र्षणिः । अ꣣भि꣢ । यो꣡नि꣢꣯म् । अ꣡यो꣢꣯हते । अ꣡यः꣢꣯ । ह꣣ते । द्रो꣡णे꣢꣯ । स꣣ध꣡स्थ꣢म् । स꣣ध꣢ । स्थ꣣म् । आ꣢ । अ꣣सदत् ॥६९०॥

Mantra without Swara
रक्षोहा विश्वचर्षणिरभि योनिमयोहते । द्रोणे सधस्थमासदत् ॥

रक्षोहा । रक्षः । हा । विश्वचर्षणिः । विश्व । चर्षणिः । अभि । योनिम् । अयोहते । अयः । हते । द्रोणे । सधस्थम् । सध । स्थम् । आ । असदत् ॥६९०॥

Samveda - Mantra Number : 690
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 5;

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1 Bhashyas
Meaning
(रक्षोहा) काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि राक्षसों का विनाशक, (विश्वचर्षणिः) विश्वरूप परमात्मा का दर्शन करानेवाला ब्रह्मज्ञानरूप सोम (योनिम्) शरीर-स्थिति इत्यादि के कारणभूत, (सधस्थम् अभि) जिसमें सब ज्ञानेन्द्रियों से उपलब्ध ज्ञान एकत्र स्थित होते हैं, उस आत्मा को लक्ष्य करके अर्थात् आत्मा में जाने के लिए (अयोहते) यम-नियम आदि रूप लोहे के हथौड़ों से ताड़ित अर्थात् संस्कृत (द्रोणे) मनरूप द्रोणकलश में (आ असदत्) आकर स्थित होता है ॥२॥
Essence
गुरुओं से समित्पाणि शिष्य के प्रति प्रवाहित किया हुआ ब्रह्मज्ञान का रस मन के माध्यम से आत्मा को ही प्राप्त होता है ॥२॥
Subject
अगले मन्त्र में पुनः उसी विषय का वर्णन है।