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Samveda Mantra 686

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- नोधा गौतमः Chhand- प्रगाथः(विषमा बृहती समा सतोबृहती) Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
द्यु꣣क्ष꣢ꣳ सु꣣दा꣢नुं꣣ त꣡वि꣢षीभि꣣रा꣡वृ꣢तं गि꣣रिं꣡ न पु꣢꣯रु꣣भो꣡ज꣢सम् । क्षु꣣म꣢न्तं꣣ वा꣡ज꣢ꣳ श꣣ति꣡न꣢ꣳ सह꣣स्रि꣡णं꣢ म꣣क्षू꣡ गोम꣢꣯न्तमीमहे ॥६८६॥

द्यु꣣क्ष꣢म् । द्यु꣣ । क्ष꣢म् । सु꣣दा꣡नु꣢म् । सु꣣ । दा꣡नु꣢꣯म् । त꣡वि꣢꣯षीभीः । आ꣡वृ꣢꣯तम् । आ । वृ꣣तम् । गिरि꣢म् । न । पु꣣रुभो꣡ज꣢सम् । पु꣣रु । भो꣡ज꣢꣯सम् । क्षु꣣म꣡न्त꣢म् । वा꣡ज꣢꣯म् । श꣢ति꣡न꣢म् । स꣣हस्रि꣡ण꣢म् । म꣣क्षू꣢ । गो꣡म꣢꣯न्तम् । ई꣣महे ॥६८६॥

Mantra without Swara
द्युक्षꣳ सुदानुं तविषीभिरावृतं गिरिं न पुरुभोजसम् । क्षुमन्तं वाजꣳ शतिनꣳ सहस्रिणं मक्षू गोमन्तमीमहे ॥

द्युक्षम् । द्यु । क्षम् । सुदानुम् । सु । दानुम् । तविषीभीः । आवृतम् । आ । वृतम् । गिरिम् । न । पुरुभोजसम् । पुरु । भोजसम् । क्षुमन्तम् । वाजम् । शतिनम् । सहस्रिणम् । मक्षू । गोमन्तम् । ईमहे ॥६८६॥

Samveda - Mantra Number : 686
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 4;

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Meaning
(द्युक्षम्) अन्तरात्मा में तेज के निवासक, (सुदानुम्) श्रेष्ठ दानी, (तविषीभिः) बलों से (आवृतम्) परिपूर्ण, (गिरिं न) पर्वत और बादल के समान (पुरुभोजसम्) बहुत पालन करनेवाले, अर्थात् जैसे पर्वत और बादल अनेक ओषधियों तथा वर्षाओं द्वारा पालन करते हैं, वैसे ही जड़-चेतन जगत् का पालन करनेवाले, (क्षुमन्तम्) अन्न-भण्डार के भण्डारी, (शतिनम्) सैकड़ों ऐश्वर्यों से युक्त, (सहस्रिणम्) सहस्रों गुणों से युक्त, (गोमन्तम्) गति करनेवाले सूर्य, चन्द्र, ग्रह, नक्षत्र आदियों के स्वामी इन्द्र परमेश्वर से हम (मक्षु) शीघ्र ही (वाजम्) अन्न, धन, ज्ञान, बल, वेग, सुख आदि की (ईमहे) याचना करते हैं ॥२॥ यहाँ उपमालङ्कार है। विशेषणों के साभिप्राय होने से परिकर है ॥२॥
Essence
सब मनुष्यों को उचित है कि जो परमेश्वर सब विद्याओं और सब ऐश्वर्यों का परम खजाना है, उसकी उपासना करके सब विद्याओं तथा समस्त भौतिक और आध्यात्मिक सम्पदाओं को प्राप्त करें ॥२॥
Subject
अगले मन्त्र में परमेश्वर से याचना करते हैं।

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