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Samveda Mantra 677

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- उशना काव्यः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
प्र꣡ तु द्र꣢꣯व꣣ प꣢रि꣣ को꣢शं꣣ नि꣡ षी꣢द꣣ नृ꣡भिः꣢ पुना꣣नो꣢ अ꣣भि꣡ वाज꣢꣯मर्ष । अ꣢श्वं꣣ न꣡ त्वा꣢ वा꣣जि꣡नं꣢ म꣣र्ज꣢य꣣न्तो꣡ऽच्छा꣢ ब꣣र्ही꣡ र꣢श꣣ना꣡भि꣢र्नयन्ति ॥६७७॥

प्र꣢ । तु । द्र꣣व । प꣡रि꣢꣯ । कोशम् । नि । सी꣣द । नृ꣡भिः꣢꣯ । पु꣡नानः꣢ । अ꣣भि꣢ । वा꣡ज꣢꣯म् । अ꣣र्ष । अ꣡श्व꣢꣯म् । न । त्वा꣣ । वाजि꣡न꣢म् । म꣣र्ज꣡य꣢न्तः । अ꣡च्छ꣢꣯ । ब꣣र्हिः꣡ । र꣣शना꣡भिः꣢ । न꣣यन्ति ॥६७७॥

Mantra without Swara
प्र तु द्रव परि कोशं नि षीद नृभिः पुनानो अभि वाजमर्ष । अश्वं न त्वा वाजिनं मर्जयन्तोऽच्छा बर्ही रशनाभिर्नयन्ति ॥

प्र । तु । द्रव । परि । कोशम् । नि । सीद । नृभिः । पुनानः । अभि । वाजम् । अर्ष । अश्वम् । न । त्वा । वाजिनम् । मर्जयन्तः । अच्छ । बर्हिः । रशनाभिः । नयन्ति ॥६७७॥

Samveda - Mantra Number : 677
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 3;

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1 Bhashyas
Meaning
हे शिष्य ! तू (तु) शीघ्र ही (प्र द्रव) उत्कृष्ट बनने के लिए प्रयत्न कर, उसके लिए (कोशम्) विद्या के खजाने गुरु का (परि निषीद) सेवन कर। (नृभिः) नेता गुरुजनों की सहायता से (पुनानः) स्वयं को पवित्र करता हुआ (वाजम्) शारीरिक और आत्मिक बल (अभ्यर्ष) प्राप्त कर। ये गुरुजन (वाजिनम्) बलवान् (त्वा) तुझे (मर्जयन्तः) शुद्ध करते हुए (रशनाभिः) नियन्त्रणों और मर्यादाओं से (बर्हिः अच्छ) ज्ञानकाण्ड व कर्मकाण्ड के प्रति (नयन्ति) प्रेरित करते हैं। कैसे? (वाजिनम् अश्वं न) जैसे बलवान् घोड़े को योद्धा लोग (रशनाभिः) लगामों से नियन्त्रित करके (बर्हिः अच्छ) संग्राम की ओर (नयन्ति) ले जाते हैं ॥१॥ इस मन्त्र में श्लिष्टोपमालङ्कार है ॥१॥
Essence
गुरुओं का हम पर महान् उपकार है, जो हम अबोध जनों को विद्यावान्, तपस्वी तथा पवित्र आचरणवाला बनाकर समुन्नत करते हैं ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा की व्याख्या पूर्वार्चिक में ५२३ क्रमाङ्क पर जीवात्मा को उद्बोधन देने के पक्ष में की जा चुकी है। यहाँ शिष्य के प्रति कहते हैं।