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Samveda Mantra 675

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- सप्तर्षयः Chhand- प्रगाथः(विषमा बृहती समा सतोबृहती) Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
पु꣣नानः꣡ सो꣢म꣣ धा꣡र꣢या꣣पो꣡ वसा꣢꣯नो अर्षसि । आ꣡ र꣢त्न꣣धा꣡ योनि꣢꣯मृ꣣त꣡स्य꣢ सीद꣣स्यु꣡त्सो꣢ दे꣣वो꣡ हि꣢र꣣ण्य꣡यः꣢ ॥६७५॥

पु꣣नानः꣢ । सो꣡म । धा꣡र꣢꣯या । अ꣣पः꣢ । व꣡सा꣢꣯नः । अ꣣र्षसि । आ । र꣣त्नधाः꣢ । र꣣त्न । धाः꣢ । यो꣡नि꣢꣯म् । ऋ꣣त꣡स्य꣢ । सी꣣दसि । उ꣡त्सः꣢꣯ । उत् । सः꣣ । देवः꣢ । हि꣣रण्य꣡यः꣢ ॥६७५॥

Mantra without Swara
पुनानः सोम धारयापो वसानो अर्षसि । आ रत्नधा योनिमृतस्य सीदस्युत्सो देवो हिरण्ययः ॥

पुनानः । सोम । धारया । अपः । वसानः । अर्षसि । आ । रत्नधाः । रत्न । धाः । योनिम् । ऋतस्य । सीदसि । उत्सः । उत् । सः । देवः । हिरण्ययः ॥६७५॥

Samveda - Mantra Number : 675
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 3;

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1 Bhashyas
Meaning
हे (सोम) ज्ञानरस के खजाने गुरुवर ! आप (धारया) ज्ञान की धारा से (पुनानः) शिष्यों को पवित्र करते हुए (अर्षसि) शिष्यों के मध्य जाते हो। (रत्नधाः) रमणीय गुणों को धारण करनेवाले आप (ऋतस्य योनिम्) सत्य के भण्डार परमात्मा को (आसीदसि) उपासते हो। आप (उत्सः) विद्या के स्रोत, (देवः) प्रकाशक और (हिरण्ययः) तेजस्वी हो ॥१॥
Essence
वही गुरु होने योग्य है, जो सब विद्याओं में पारंगत, अध्यापनकला में प्रवीण, चारित्र्यवान्, सच्चरित्र बनानेवाला, शिष्यों का पितृतुल्य, तेजस्वी, गुणवान्, गुणप्रशंसक, परब्रह्म का द्रष्टा और परब्रह्म का साक्षात्कार कराने में समर्थ हो ॥१॥
Subject
प्रथम ऋचा पूर्वार्चिक में ५११ क्रमाङ्क पर परमात्मा के पक्ष में व्याख्यात की गयी थी। यहाँ गुरु का वर्णन है।