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Samveda Mantra 671

1875 Mantra
Devata- इन्द्राग्नी Rishi- विश्वामित्रो गाथिनः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
इ꣡न्द्र꣢म꣣ग्निं꣡ क꣢वि꣣च्छ꣡दा꣢ य꣣ज्ञ꣡स्य꣢ जू꣣त्या꣡ वृ꣢णे । ता꣡ सोम꣢꣯स्ये꣣ह꣡ तृ꣢म्पताम् ॥६७१॥

इ꣡न्द्र꣢꣯म् । अ꣣ग्नि꣢म् । क꣣विच्छ꣡दा꣢ । क꣣वि । छ꣡दा꣢꣯ । य꣣ज्ञ꣡स्य꣢ । जू꣣त्या꣢ । वृ꣣णे । ता꣢ । सो꣢म꣢꣯स्य । इ꣡ह꣢ । तृ꣣म्पताम् ॥६७१॥

Mantra without Swara
इन्द्रमग्निं कविच्छदा यज्ञस्य जूत्या वृणे । ता सोमस्येह तृम्पताम् ॥

इन्द्रम् । अग्निम् । कविच्छदा । कवि । छदा । यज्ञस्य । जूत्या । वृणे । ता । सोमस्य । इह । तृम्पताम् ॥६७१॥

Samveda - Mantra Number : 671
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 2;

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1 Bhashyas
Meaning
मैं (यज्ञस्य) विद्यायज्ञ की (जूत्या) शीघ्र सिद्धि के लिए (कविच्छदा) मेधावियों को दुःख, विपत्ति आदि से बचानेवाले (इन्द्रम् अग्निम्) आत्मा और मन को (वृणे) स्वीकार करता हूँ। (ता) वे दोनों (इह) इस विद्यायज्ञ में (सोमस्य) ज्ञानरस से (तृम्पताम्) तृप्ति प्रदान करें ॥३॥
Essence
आत्मा-रूप यजमान, मन-रूप होता और आचार्य-रूप ब्रह्मा के द्वारा सम्पादित विद्या-यज्ञ सफल एवं प्रभावकारी होता है ॥३॥ प्रथम खण्ड में परब्रह्म और ब्रह्मानन्द का वर्णन है और द्वितीय खण्ड में यह वर्णन है कि वह ब्रह्मानन्द तभी प्राप्त किया जा सकता है, जब आत्मा और मन उसके लिए प्रयत्नशील होते हैं। अतः द्वितीय खण्ड की प्रथम खण्ड के साथ संगति है ॥ प्रथम अध्याय में द्वितीय खण्ड समाप्त ॥
Subject
अगले मन्त्र में पुनः उसी विषय का वर्णन है।