Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Samveda Mantra 669

1875 Mantra
Devata- इन्द्राग्नी Rishi- विश्वामित्रो गाथिनः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
इ꣡न्द्रा꣢ग्नी꣣ आ꣡ ग꣢तꣳ सु꣣तं꣢ गी꣣र्भि꣢꣫र्न꣣भो व꣡रे꣢ण्यम् । अ꣣स्य꣡ पा꣢तं धि꣣ये꣢षि꣣ता꣢ ॥६६९॥

इ꣡न्द्रा꣢꣯ग्नी । इ꣡न्द्र꣢꣯ । अ꣣ग्नीइ꣡ति꣢ । आ । ग꣣तम् । सुत꣢म् । गी꣣र्भिः꣢ । न꣡भः꣢꣯ । व꣡रेण्य꣢꣯म् । अ꣣स्य꣢ । पा꣣तम् । धिया꣢ । इ꣣षि꣢ता ॥६६९॥

Mantra without Swara
इन्द्राग्नी आ गतꣳ सुतं गीर्भिर्नभो वरेण्यम् । अस्य पातं धियेषिता ॥

इन्द्राग्नी । इन्द्र । अग्नीइति । आ । गतम् । सुतम् । गीर्भिः । नभः । वरेण्यम् । अस्य । पातम् । धिया । इषिता ॥६६९॥

Samveda - Mantra Number : 669
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 2;

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्राग्नी) आत्मा और मन ! तुम दोनों (गीर्भिः) गुरुओं की वाणियों से (सुतम्) निष्पादित, (नभः) सूर्य के समान प्रकाशयुक्त (वरेण्यम्) वरणीय श्रेष्ठ ज्ञानरस को ग्रहण करने के लिए (आगतम्) आओ। (इषिता) तत्पर एवं प्रयत्नशील होकर तुम दोनों (धिया) बुद्धि द्वारा (अस्य) इस ज्ञान की (पातम्) रक्षा करो ॥१॥ इस मन्त्र में ‘नभः’ अर्थात् ‘सूर्य के समान प्रकाशमान’ में वाचकधर्मलुप्तोपमालङ्कार है ॥१॥
Essence
वाणी का अधिपति गुरु शिष्य को जिस ज्ञान का उपदेश करता है, उसे उसको सावधानी के साथ अपने आत्मा, मन और बुद्धि के योगपूर्वक सुनकर और उस पर मनन करके हृदय में धारण कर लेना चाहिए, उसका प्रचार करना चाहिए तथा उसके अनुसार आचरण करना-करवाना चाहिए ॥१॥
Subject
प्रथम मन्त्र में ‘इन्द्राग्नी’ नाम से जीवात्मा और मन का आह्वान किया गया है। इन्द्र आत्मा अर्थ में प्रसिद्ध है। अग्नि के विषय में शतपथ ब्राह्मण १०।१।२।३ में कहा है कि ‘मन ही अग्नि है’।