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Samveda Mantra 668

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- इरिम्बिठिः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ब्र꣣ह्मा꣡ण꣢स्त्वा यु꣣जा꣢ व꣣य꣡ꣳ सो꣢म꣣पा꣡मि꣢न्द्र सो꣣मि꣡नः꣢ । सु꣣ता꣡व꣢न्तो हवामहे ॥६६८॥

ब्र꣣ह्मा꣡णः꣢ । त्वा꣣ । युजा꣢ । व꣣य꣢म् । सो꣣मपा꣢म् । सो꣣म । पा꣢म् । इ꣣न्द्र । सो꣡मिनः꣢ । सु꣣ता꣡वन्तः꣢ । ह꣣वामहे ॥६६८॥

Mantra without Swara
ब्रह्माणस्त्वा युजा वयꣳ सोमपामिन्द्र सोमिनः । सुतावन्तो हवामहे ॥

ब्रह्माणः । त्वा । युजा । वयम् । सोमपाम् । सोम । पाम् । इन्द्र । सोमिनः । सुतावन्तः । हवामहे ॥६६८॥

Samveda - Mantra Number : 668
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 2;

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Meaning
हे (इन्द्र) आत्मन् ! हे शिष्य ! (सोमपाम्) ज्ञान का पान करनेवाले (त्वा) तुझे (सोमिनः) ज्ञानवान्, (सुतावन्तः) शिष्यरूप पुत्रोंवाले, (ब्रह्माणः) ब्रह्मज्ञानी (वयम्) हम गुरुजन (युजा) पारस्परिक सहयोग के साथ अथवा तेरे साथ घनिष्ठ सम्बन्धपूर्वक (हवामहे) विद्या पढ़ाने और सदाचार सिखाने के लिए बुलाते हैं ॥३॥
Essence
जो स्वयं विद्यावान्, सदाचारी और ब्रह्म का अनुभव प्राप्त किये हुए गुरु होते हैं, वे ही शिष्यों को विद्वान् सदाचारी और ब्रह्मज्ञानी बना सकते हैं ॥३॥
Subject
अगले मन्त्र में पुनः उसी विषय का उपदेश किया गया है।