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Samveda Mantra 66

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- कुत्स आङ्गिरसः Chhand- जगती Swara- निषादः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
इ꣣म꣢꣫ꣳ स्तो꣣म꣡मर्ह꣢ते जा꣣त꣡वे꣢दसे र꣡थ꣢मिव꣣ सं꣡ म꣢हेमा मनी꣣ष꣡या꣢ । भ꣣द्रा꣢꣫ हि नः꣣ प्र꣡म꣢तिरस्य स꣣ꣳस꣡द्यग्ने꣢꣯ स꣣ख्ये꣡ मा रि꣢꣯षामा व꣣यं꣡ तव꣢꣯ ॥६६॥

इ꣣म꣢म् । स्तो꣡मम꣢꣯म् । अ꣡र्ह꣢꣯ते । जा꣣त꣡वे꣢दसे । जा꣣त꣢ । वे꣣दसे । र꣡थ꣢꣯म् । इ꣣व । स꣢꣯म् । म꣣हेम । मनीष꣡या꣢ । भ꣣द्रा꣢ । हि । नः꣣ । प्र꣡म꣢꣯तिः । प्र । म꣣तिः । अस्य । सँस꣡दि꣢ । सम् । स꣡दि꣢꣯ । अ꣡ग्ने꣢꣯ । स꣣ख्ये꣢ । स꣣ । ख्ये꣢ । मा । रि꣣षाम । वय꣢म् । त꣡व꣢꣯ ॥६६॥

Mantra without Swara
इमꣳ स्तोममर्हते जातवेदसे रथमिव सं महेमा मनीषया । भद्रा हि नः प्रमतिरस्य सꣳसद्यग्ने सख्ये मा रिषामा वयं तव ॥

इमम् । स्तोममम् । अर्हते । जातवेदसे । जात । वेदसे । रथम् । इव । सम् । महेम । मनीषया । भद्रा । हि । नः । प्रमतिः । प्र । मतिः । अस्य । सँसदि । सम् । सदि । अग्ने । सख्ये । स । ख्ये । मा । रिषाम । वयम् । तव ॥६६॥

Samveda - Mantra Number : 66
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 7;

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1 Bhashyas
Meaning
(अर्हते) पूजायोग्य (जातवेदसे) सब उत्पन्न पदार्थों के ज्ञाता, सब उत्पन्न पदार्थों में विद्यमान, सकल धन के उत्पादक और वेदज्ञान को प्रकट करनेवाले परमेश्वर के लिए (मनीषया) मनोयोग के साथ (स्तोमम्) स्तोत्र को (संमहेम) सत्कारपूर्वक भेजें, (रथम् इव) जैसे किसी पूज्य जन को बुलाने के लिए उसके पास रथ भेजा जाता है। (अस्य) इस परमेश्वर की (संसदि) संगति में (नः) हमारी (प्रमतिः) प्रखर बुद्धि (भद्रा हि) भद्र ही होती है। हे (अग्ने) तेजस्वी परमात्मन् ! (वयम्) हम प्रजाजन (तव) आपकी (सख्ये) मित्रता में (मा) मत (रिषाम) हिंसित होवें ॥४॥ स्तोत्र को रथ के समान सत्कारपूर्वक भेजें—यहाँ पूर्णोपमा अलङ्कार है। जैसे किसी सुयोग्य विद्वान् को अपने उत्सवों में लाने के लिए उसके निमित्त रथ भेजा जाता है, वैसे ही पूज्य परमेश्वर को अपने हृदय-गृह में लाने के लिए उसके निमित्त स्तोत्र भेजा जाए। यह भाषा आलङ्कारिक समझनी चाहिए क्योंकि परमेश्वर तो पहले से ही हमारे हृदयों में विद्यमान है ॥४॥
Essence
अव्यक्तरूप से हृदय में स्थित परमेश्वर हमारे स्तोत्र से जाग जाता है और हमारी बुद्धि को श्रेष्ठ मार्ग पर चलनेवाली भद्र बनाकर विनाश से हमारी रक्षा करता है ॥४॥
Subject
अगले मन्त्र में यह कहा गया है कि परमेश्वर की स्तुति और उसकी संगति से हम क्या प्राप्त करें।