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Samveda Mantra 657

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- शतं वैखानसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
प꣡व꣢मानस्य ते कवे꣣ वा꣢जि꣣न्त्स꣡र्गा꣢ असृक्षत । अ꣡र्व꣢न्तो꣣ न꣡ श्र꣢व꣣स्य꣡वः꣢ ॥६५७॥

प꣡व꣢꣯मानस्य । ते꣣ । कवे । वा꣡जि꣢꣯न् । स꣡र्गाः꣢꣯ । अ꣣सृक्षत । अ꣡र्व꣢꣯न्तः । न । श्र꣣वस्य꣡वः꣢ ॥६५७॥

Mantra without Swara
पवमानस्य ते कवे वाजिन्त्सर्गा असृक्षत । अर्वन्तो न श्रवस्यवः ॥

पवमानस्य । ते । कवे । वाजिन् । सर्गाः । असृक्षत । अर्वन्तः । न । श्रवस्यवः ॥६५७॥

Samveda - Mantra Number : 657
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 1;

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1 Bhashyas
Meaning
हे (कवे) वेदकाव्य के कवि ! हे (वाजिन्) बली परमेश्वर ! (पवमानस्य ते) तुझ पवित्र करनेवाले की (सर्गाः) आनन्द-धाराएँ (श्रवस्यवः) हमें यशस्वी बनाना चाहती हुई (असृक्षत) छूट रही हैं, (न) जैसे (अर्वन्तः) घोड़े [घुड़साल से छूटते हैं।] घोड़े भी कैसे होते हैं? (श्रवस्यवः) घासादि भोज्य को चाहनेवाले। अभिप्राय यह है कि जैसे बाहर जाकर चरागाहों में घास चरना चाहनेवाले घोड़े घुड़साल में से उत्सुकतापूर्वक निकलते हैं, ऐसे ही आपकी आनन्दधाराएँ आपमें से निकलकर हमें आनन्दित कर रही हैं ॥१॥ इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। ‘श्रवस्यवः’ में श्लेष है ॥१॥
Essence
परमात्मा के उपासक लोग परमात्मा से अपने आत्मा में प्रवेश करते हुए महान् आनन्द के झरनों को साक्षात् अनुभव करते हैं ॥१॥
Subject
प्रथम मन्त्र में परमात्मा-रूप सोम की रसधाराओं का वर्णन है।