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Samveda Mantra 655

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- कश्यपो मारीचः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
हि꣣न्वानो꣢ हे꣣तृ꣡भि꣢र्हि꣣त꣡ आ वाजं꣢꣯ वा꣣꣬ज्य꣢꣯क्रमीत् । सी꣡द꣢न्तो व꣣नु꣡षो꣢ यथा ॥६५५॥

हि꣣न्वानः꣢ । हे꣣तृ꣡भिः꣢ । हि꣣तः꣢ । आ । वा꣡जम्꣢꣯ । वा꣣जी꣢ । अ꣣क्रमीत् । सी꣡द꣢꣯न्तः । व꣣नु꣡षः꣢ । य꣣था ॥६५५॥

Mantra without Swara
हिन्वानो हेतृभिर्हित आ वाजं वाज्यक्रमीत् । सीदन्तो वनुषो यथा ॥

हिन्वानः । हेतृभिः । हितः । आ । वाजम् । वाजी । अक्रमीत् । सीदन्तः । वनुषः । यथा ॥६५५॥

Samveda - Mantra Number : 655
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 1;

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Meaning
(हेतृभिः) प्रेरक गुरुजनों के द्वारा (हितः) शिष्य के आत्मा में स्थापित किया हुआ, (हिन्वानः) तृप्ति प्रदान करता हुआ, (वाजी) बलवान् परमात्मा-रूप सोम (वाजम्) अन्तःकरण में चल रहे देवासुरसंग्राम पर (आ अक्रमीत्) चारों ओर से आक्रमण कर देता है, (यथा) जैसे (सीदन्तः) प्रयाण करते हुए (वनुषः) हिंसक योद्धा लोग [शत्रुओं पर आक्रमण करते हैं।] ॥२॥ इस मन्त्र में उपमालङ्कार है ॥२॥
Essence
हृदय में धारण किया हुआ परमेश्वर आन्तरिक देवासुरसंग्राम में अपने उपासक को सदा विजय दिलाता है ॥२॥
Subject
अगले मन्त्र में यह कहा गया है कि हृदय में धारण किया हुआ परमात्मारूप सोम क्या करता है।

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