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Samveda Mantra 651

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- असितः काश्यपो देवलो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
उ꣡पा꣢स्मै गायता नरः꣣ प꣡व꣢माना꣣ये꣡न्द꣢वे । अ꣣भि꣢ दे꣣वा꣡ꣳ इय꣢꣯क्षते ॥६५१॥

उ꣡प꣢꣯ । अ꣣स्मै । गायत । नरः । प꣡व꣢꣯मानाय । इ꣡न्द꣢꣯वे । अ꣣भि꣢ । दे꣣वा꣢न् । इ꣡य꣢꣯क्षते ॥६५१॥

Mantra without Swara
उपास्मै गायता नरः पवमानायेन्दवे । अभि देवाꣳ इयक्षते ॥

उप । अस्मै । गायत । नरः । पवमानाय । इन्दवे । अभि । देवान् । इयक्षते ॥६५१॥

Samveda - Mantra Number : 651
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 1;

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1 Bhashyas
Meaning
हे (नरः) मनुष्यो ! तुम (देवान्) अहिंसा, सत्य, न्याय आदि दिव्यगुणों को (इयक्षते) प्रदान करने की इच्छावाले (अस्मै) इस (पवमानाय) पवित्रता देनेवाले, (इन्दवे) आनन्दरस से भिगोनेवाले परमात्मा के लिए (उपगायत) समीप होकर स्तुतिगीत गाया करो ॥१॥
Essence
सब स्त्री-पुरुषों को चाहिए कि जगदीश के स्तुतिगीतों का कीर्तन कर और उससे प्रेरणा पाकर अपनी उन्नति करें ॥१॥
Subject
प्रथम मन्त्र में परमात्मा के प्रति मनुष्यों का कर्तव्य वर्णित किया गया है।