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Samveda Mantra 631

1875 Mantra
Devata- सूर्यः Rishi- सार्पराज्ञी Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- आरण्यं काण्डम् Gaan- आरण्य गान
Mantra with Swara
अ꣣न्त꣡श्च꣢रति रोच꣣ना꣢꣫स्य प्रा꣣णा꣡द꣢पान꣣ती꣢ । व्य꣢꣯ख्यन्महि꣣षो꣡ दिव꣢꣯म् ॥६३१॥

अ꣣न्त꣡रिति꣢ । च꣣रति । रोचना꣢ । अ꣣स्य꣢ । प्रा꣣णा꣢त् । प्र꣣ । आना꣢त् । अ꣣पानती꣢ । अ꣣प । अनती꣢ । वि । अ꣣ख्यत् । महिषः꣢ । दि꣡व꣢꣯म् ॥६३१॥

Mantra without Swara
अन्तश्चरति रोचनास्य प्राणादपानती । व्यख्यन्महिषो दिवम् ॥

अन्तरिति । चरति । रोचना । अस्य । प्राणात् । प्र । आनात् । अपानती । अप । अनती । वि । अख्यत् । महिषः । दिवम् ॥६३१॥

Samveda - Mantra Number : 631
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 5;

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Meaning
(अस्य) इस सूर्य वा परमात्मा की (रोचना) दीप्ति (प्राणात्) प्राण-व्यापार के पश्चात् (अपानती) अपान व्यापार कराती हुई (अन्तः) भूमि पर वा हृदय के अन्दर (चरति) विचरती है। यह (महिषः) महान् सूर्य वा परमात्मा (दिवम्) आकाश को वा जीवात्मा को (व्यख्यत्) प्रकाशित करता है ॥५॥ इस मन्त्र में अर्थश्लेषालङ्कार है ॥५॥
Essence
जो यह प्राण प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान रूप से शरीर में स्थित हुआ प्राणन, अपानन आदि व्यापार करता है, वह परमेश्वर की ही महिमा से करता है, जैसाकि उपनिषद् के ऋषि ने कहा है—‘परमेश्वर प्राण का भी प्राण है (केन० १।२)। परमेश्वर से रचित सूर्य भी अपनी किरणों से प्राणियों को प्राण प्रदान करता हुआ प्राणापान आदि क्रियाओं में सहायक होता है, जैसाकि प्रश्नोपनिषद् में कहा है—‘यह सूर्य प्रजाओं का प्राण होकर उदित हो रहा है।’ (प्रश्न० १।८) परमेश्वर ही सूर्य के द्वारा आकाशस्थ पिण्डों को भी प्रकाशित करता है ॥५॥
Subject
अगले मन्त्र में सूर्य और परमात्मा के तेज का वर्णन है।

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