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Samveda Mantra 624

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः Kaand Name- आरण्यं काण्डम् Gaan- आरण्य गान
Mantra with Swara
य꣢꣫द्वर्चो꣣ हि꣡र꣢ण्यस्य꣣ य꣢द्वा꣣ व꣢र्चो꣣ ग꣡वा꣢मु꣣त꣢ । स꣣त्य꣢स्य꣣ ब्र꣡ह्म꣢णो꣣ व꣢र्च꣣स्ते꣡न꣢ मा꣣ स꣡ꣳ सृ꣢जामसि ॥६२४

य꣢त् । व꣡र्चः꣢꣯ । हि꣡र꣢꣯ण्यस्य । यत् । वा꣣ । व꣡र्चः꣢꣯ । ग꣡वा꣢꣯म् । उ꣣त꣢ । स꣣त्य꣡स्य꣢ । ब्र꣡ह्म꣢꣯णः । व꣡र्चः꣢꣯ । ते꣡न꣢꣯ । मा꣣ । स꣢म् । सृ꣣जामसि ॥६२४॥

Mantra without Swara
यद्वर्चो हिरण्यस्य यद्वा वर्चो गवामुत । सत्यस्य ब्रह्मणो वर्चस्तेन मा सꣳ सृजामसि ॥६२४

यत् । वर्चः । हिरण्यस्य । यत् । वा । वर्चः । गवाम् । उत । सत्यस्य । ब्रह्मणः । वर्चः । तेन । मा । सम् । सृजामसि ॥६२४॥

Samveda - Mantra Number : 624
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 4;

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1 Bhashyas
Meaning
(यत्) जो अनुपम (वर्चः) तेज (हिरण्यस्य) सुवर्ण का होता है, (उत) और (यद् वा) जो अद्भुत (वर्चः) तेज (गवाम्) गौओं का अथवा सूर्य-किरणों का होता है और जो (सत्यस्य ब्रह्मणः) सत्य ज्ञान का (वर्चः) तेज होता है, (तेन) उस तेज से, हम (मा) अपने-आपको (संसृजामसि) संयुक्त करते हैं ॥१०॥
Essence
जो सुवर्ण में रमणीयता और बहुमूल्यता का, गायों में परोपकारिता का, सूर्यकिरणों में प्राणप्रदानता का, सत्य वेदज्ञान में शुद्धता का तेज होता है, वह तेज मनुष्यों को भी प्राप्त करना चाहिए ॥१०॥
Subject
अगले मन्त्र में वर्चस् की आकांक्षा की गयी है।