Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Samveda Mantra 623

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः Kaand Name- आरण्यं काण्डम् Gaan- आरण्य गान
Mantra with Swara
ह꣡री꣢ त इन्द्र꣣ श्म꣡श्रू꣢ण्यु꣣तो꣡ ते꣢ ह꣣रि꣢तौ꣣ ह꣡री꣢ । तं꣡ त्वा꣢ स्तुवन्ति क꣣व꣡यः꣢ पु꣣रु꣡षा꣢सो व꣣न꣡र्ग꣢वः ॥६२३

ह꣡री꣢꣯ । ते꣣ । इन्द्र । श्म꣡श्रू꣢꣯णि । उ꣣त꣢ । उ꣣ । ते । हरि꣡तौ꣢ । हरी꣣इ꣡ति꣢ । तम् । त्वा꣣ । स्तुवन्ति । कव꣡यः꣢ । प꣣रुषा꣡सः꣢ । व꣣न꣡र्ग꣢वः ॥६२३॥

Mantra without Swara
हरी त इन्द्र श्मश्रूण्युतो ते हरितौ हरी । तं त्वा स्तुवन्ति कवयः पुरुषासो वनर्गवः ॥६२३

हरी । ते । इन्द्र । श्मश्रूणि । उत । उ । ते । हरितौ । हरीइति । तम् । त्वा । स्तुवन्ति । कवयः । परुषासः । वनर्गवः ॥६२३॥

Samveda - Mantra Number : 623
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 4;

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्र) परमैश्वर्यशाली परमात्मन् ! (ते) तेरी रचित (श्मश्रूणि) मूँछों के समान प्रतीत होनेवाली सूर्यकिरणें (हरी) मलिनताओं को हरनेवाली हैं, (उत उ) और (ते) तेरी रचित (हरितौ) पूर्व-पश्चिमरूप, उत्तर-दक्षिणरूप अथवा ध्रुवा-ऊर्ध्वारूप दिशाएँ (हरी) मलिनता को हरनेवाली हैं। (तं त्वा) उस तेरी (वनर्गवः) वनगामी वानप्रस्थ (कवयः परुषासः) मेधावी पुरुष (स्तुवन्ति) स्तुति करते हैं ॥९॥ इस मन्त्र में ‘हरी’ की आवृत्ति में यमक तथा ‘हरी, हरि, हरी’ में वृत्त्यनुप्रास अलङ्कार है। सूर्यकिरणों को श्मश्रु कहने में असम्बन्ध में सम्बन्ध रूप अतिशयोक्ति अलङ्कार है ॥९॥
Essence
परमात्मा द्वारा रचित सूर्य, चन्द्र, तारे, दिशाएँ, विदिशाएँ आदि सभी पदार्थ विलक्षण और उसकी महिमा के प्रकाशक हैं ॥९॥
Subject
अगले मन्त्र का देवता इन्द्र है। इन्द्र नाम से परमात्मा का वर्णन है।