Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Samveda Mantra 617

1875 Mantra
Devata- पुरुषः Rishi- नारायणः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः Kaand Name- आरण्यं काण्डम् Gaan- आरण्य गान
Mantra with Swara
स꣣ह꣡स्र꣢शीर्षाः꣣ पु꣡रु꣢षः सहस्रा꣣क्षः꣢ स꣣ह꣡स्र꣢पात् । स꣢꣯ भूमि꣢꣯ꣳ स꣣र्व꣡तो꣢ वृ꣣त्वा꣡त्य꣢तिष्ठद्द꣣शाङ्गुल꣢म् ॥६१७॥

स꣣ह꣡स्र꣢शीर्षाः । स꣣ह꣡स्र꣢ । शी꣣र्षाः । पु꣡रु꣢꣯षः । स꣣हस्राक्षः꣢ । स꣣हस्र । अक्षः꣢ । स꣣ह꣡स्र꣢पात् । स꣣ह꣡स्र꣢ । पा꣣त् । सः꣢ । भू꣡मि꣢꣯म् । स꣣र्व꣡तः꣢ । वृ꣣त्वा꣢ । अ꣡ति꣢꣯ । अ꣣तिष्ठत् । दशाङ्गुल꣢म् । द꣣श । अङ्गुल꣢म् ॥६१७॥

Mantra without Swara
सहस्रशीर्षाः पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात् । स भूमिꣳ सर्वतो वृत्वात्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम् ॥

सहस्रशीर्षाः । सहस्र । शीर्षाः । पुरुषः । सहस्राक्षः । सहस्र । अक्षः । सहस्रपात् । सहस्र । पात् । सः । भूमिम् । सर्वतः । वृत्वा । अति । अतिष्ठत् । दशाङ्गुलम् । दश । अङ्गुलम् ॥६१७॥

Samveda - Mantra Number : 617
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 4;

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
(पुरुषः) सबका अग्रनेता, सब जगत् में परिपूर्ण और सबका पालनकर्ता परमेश्वर (सहस्रशीर्षाः) सहस्रों सिरोंवाला अर्थात् अनन्तज्ञानी, (सहस्राक्षः) सहस्रों आँखोंवाला अर्थात् सर्वद्रष्टा, और (सहस्रपात्) सहस्रों पैरोंवाला अर्थात् सर्वत्र व्याप्त है। (सः) वह (भूमिम्) पृथिवी को (सर्वतः) सब ओर से (वृत्वा) घेरकर (दशाङ्गुलम्) दसों इन्द्रियों को (अति) अतिक्रान्त करके (अतिष्ठत्) स्थित है, अर्थात् दसों इन्द्रियों की पहुँच से परे है। कहा भी है—न वहाँ आँख की पहुँच है, न वाणी की, न मन की (केन उप० १।३) ॥३॥ यास्काचार्य पुरुष शब्द का निर्वचन करते हुए लिखते हैं—पुरी में बैठने से या पुरी में शयन करने से पुरुष कहाता है (पुरिसद् या पुरिश=पुरुष) अथवा यह वृद्ध्यर्थक पूरी धातु से निष्पन्न हुआ है (पूरी आप्यायने)। अन्तःपुरुष परमात्मा को पुरुष इस कारण कहते हैं, क्योंकि वह सारे ब्रह्माण्ड को अपनी सत्ता से पूर्ण किये हुए है। कहा भी है, जिससे अधिक पर या अपर कोई वस्तु नहीं है, जिससे अधिक अणु या महान् कोई वस्तु नहीं है, वह एक पुरुष परमेश्वर वृक्ष के समान निश्चल होकर अपने तेजःस्वरूप में स्थित है, उस पुरुष से यह सकल ब्रह्माण्ड परिपूर्ण है (निरु० २।३) ॥ इस मन्त्र में सहस्र सिरवाला होने आदि रूप तथा भूमि में सर्वत्र व्यापक होने रूप कारण के विद्यमान होते हुए भी इन्द्रियगोचर होने रूप कार्य की उत्पत्ति न होने से विशेषोक्ति अलङ्कार है ॥३॥
Essence
सबको उचित है कि सर्वज्ञाता, सर्वद्रष्टा, सर्वव्यापक, सर्वत्र भूगोल को व्याप्त करके स्थित, तथापि वाणी, आँख, कान, हाथ, पैर आदि की पहुँच से परे विद्यमान परमपुरुष परमात्मा का साक्षात्कार करके अनन्त सुख का भोग करें ॥३॥
Subject
अगली पाँच ऋचाओं का पुरुष देवता है। परम पुरुष परमात्मा का वर्णन करते हैं।