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Samveda Mantra 612

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- हिरण्यस्तूप आङ्गिरसः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः Kaand Name- आरण्यं काण्डम् Gaan- आरण्य गान
Mantra with Swara
इ꣡न्द्र꣢स्य꣣ नु꣢ वी꣣꣬र्या꣢꣯णि꣣ प्र꣡वो꣢चं꣣ या꣡नि꣢ च꣣का꣡र꣢ प्रथ꣣मा꣡नि꣢ व꣣ज्री꣢ । अ꣢ह꣣न्न꣢हि꣣म꣢न्व꣣प꣡स्त꣢तर्द꣣ प्र꣢ व꣣क्ष꣡णा꣢ अभिन꣣त्प꣡र्व꣢तानाम् ॥६१२॥

इ꣡न्द्र꣢꣯स्य । नु । वी꣣र्या꣢꣯णि । प्र । वो꣣चम् । या꣡नि꣢꣯ । च꣣का꣡र꣢ । प्र꣣थमा꣡नि꣢ । व꣣ज्री꣢ । अ꣡ह꣢꣯न् । अ꣡हि꣢꣯म् । अ꣡नु꣢꣯ । अ꣣पः꣢ । त꣣तर्द । प्र꣢ । व꣣क्ष꣡णाः꣢ । अ꣣भिनत् । प꣡र्व꣢꣯तानाम् ॥६१२॥

Mantra without Swara
इन्द्रस्य नु वीर्याणि प्रवोचं यानि चकार प्रथमानि वज्री । अहन्नहिमन्वपस्ततर्द प्र वक्षणा अभिनत्पर्वतानाम् ॥

इन्द्रस्य । नु । वीर्याणि । प्र । वोचम् । यानि । चकार । प्रथमानि । वज्री । अहन् । अहिम् । अनु । अपः । ततर्द । प्र । वक्षणाः । अभिनत् । पर्वतानाम् ॥६१२॥

Samveda - Mantra Number : 612
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 3;

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1 Bhashyas
Meaning
प्रथम—परमात्मा, सूर्य और विद्युत् के पक्ष में। मैं (इन्द्रस्य) वीर परमात्मा, पदार्थों को अवयव रूप में विछिन्न करनेवाले सूर्य और परमैश्वर्य की साधनभूत विद्युत् के (नु) शीघ्र (वीर्याणि) क्रमशः सृष्टि के उत्पत्ति-स्थिति-संहाररूप, आकर्षण-प्रकाशन आदि रूप और भूयान, जलयान, अन्तरिक्षयान तथा विविध यन्त्रों के चलाने रूप वीरता के कर्मों का (प्र वोचम्) वर्णन करता हूँ, (यानि प्रथमानि) जिन उत्कृष्ट कर्मों को, वह (वज्री) शक्तिधारी (चकार) करता है। उन्हीं वीरता के कर्मों में से एक का कथन करते हैं—वह परमात्मा, वह सूर्य और वह विद्युत् (अहिम्) अन्तरिक्ष में स्थित बादल का (अहन्) संहार करता है, (अपः) बादल में स्थित जलों को (अनु ततर्द) तोड़-तोड़कर नीचे गिराता है, (पर्वतानाम्) पहाड़ों की (वक्षणाः) नदियों को (प्र अभिनत्) बर्फ तोड़-तोड़कर प्रवाहित करता है ॥ द्वितीय—राष्ट्र के पक्ष में। मैं (इन्द्रस्य) शत्रुविदारक राजा के (नु) शीघ्र ही (वीर्याणि) शत्रुविजय, राष्ट्रनिर्माण आदि वीरतापूर्ण कर्मों को (प्र वोचम्) भली-भाँति वर्णित करता हूँ, (यानि प्रथमानि) जिन श्रेष्ठ कर्मों को (वज्री) तलवार, बन्दूक, तोप, गोले आदि शस्त्रास्त्रों से युक्त वह (चकार) करता है। वह (अहिम्) साँप के समान टेढ़ी चालवाले, विषधर, राष्ट्र की उन्नति में बाधक शत्रु का (अहन्) संहार करता है, (अपः) जलों के समान उमड़नेवाले शत्रु-दलों को (ततर्द) छीलता है, (पर्वतानाम्) किलों की (वक्षणाः) सेनाओं को (अभिनत्) छिन्न-भिन्न करता है ॥११॥ इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। अहन्, अनुततर्द, प्राभिनत् इन अनेक क्रियाओं में एक कारक का योग होने से दीपकालङ्कार भी है ॥११॥
Essence
जैसे परमेश्वर सूर्य द्वारा अथवा आकाशीय बिजली द्वारा मेघ का संहार कर रुके हुए जलों को नीचे बरसाता और नदियों को बहाता है, वैसे ही राष्ट्र का राजा विघ्नकारी शत्रुओं को मार कर, किलों में भी स्थित सेनाओं को हरा कर राष्ट्र में सब ऐश्वर्यों को प्रवाहित करे ॥११॥
Subject
अगले मन्त्र का देवता इन्द्र है। इन्द्र नाम से परमात्मा, राजा आदि के पराक्रमों का वर्णन है।