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Samveda Mantra 58

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- सौभरि: काण्व: Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
प्र꣢꣫ यो रा꣣ये꣡ निनी꣢꣯षति꣣ म꣢र्तो꣣ य꣡स्ते꣢ वसो꣣ दा꣡श꣢त् । स꣢ वी꣣रं꣡ ध꣢त्ते अग्न उक्थशꣳ꣣सि꣢नं꣣ त्म꣡ना꣢ सहस्रपो꣣षि꣡ण꣢म् ॥५८॥

प्र꣢ । यः । रा꣣ये꣢ । नि꣡नी꣢꣯षति । म꣡र्तः꣢꣯ । यः । ते꣣ । वसो । दा꣡श꣢꣯त् । सः । वी꣣र꣢म् । ध꣣त्ते । अग्ने । उक्थशँसि꣡न꣢म् । उ꣣क्थ । शँसि꣡न꣢म् । त्म꣡ना꣢꣯ । स꣣हस्रपोषि꣡ण꣢म् । स꣣हस्र । पोषि꣡ण꣢म् ॥५८॥

Mantra without Swara
प्र यो राये निनीषति मर्तो यस्ते वसो दाशत् । स वीरं धत्ते अग्न उक्थशꣳसिनं त्मना सहस्रपोषिणम् ॥

प्र । यः । राये । निनीषति । मर्तः । यः । ते । वसो । दाशत् । सः । वीरम् । धत्ते । अग्ने । उक्थशँसिनम् । उक्थ । शँसिनम् । त्मना । सहस्रपोषिणम् । सहस्र । पोषिणम् ॥५८॥

Samveda - Mantra Number : 58
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 6;

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1 Bhashyas
Meaning
हे (वसो) सर्वान्तर्यामिन्, सबके निवासक (अग्ने) जगन्नायक परमात्मन् ! (यः) जो कोई (मर्तः) मनुष्य (राये) विद्या-विवेक-विनय आदि धन के लिए, श्रेष्ठ सन्तानरूप धन के लिए और सुवर्ण आदि धन के लिए (प्र निनीषति) अपने-आपको प्रगति के मार्ग पर ले जाना चाहता है, पुरुषार्थ में नियुक्त करना चाहता है, और (यः) जो (ते) आपके लिए (दाशत्) आत्मसमर्पण करता है, (सः) वह मनुष्य (त्मना) अपने आप (सहस्रपोषिणम्) सहस्रों निर्धनों को धनदान से और सहस्रों अविद्याग्रस्तों को विद्यादान से परिपुष्ट करनेवाले (वीरम्) वीर सन्तान को (धत्ते) प्राप्त करता है ॥४॥
Essence
पुरुषार्थी परमेश्वरोपासक मनुष्य सुयोग्य सन्तान, विद्या, धन, चक्रवर्ती राज्य, मोक्ष आदि बहुत प्रकार के ऐश्वर्य को प्राप्त कर लेत है ॥४॥
Subject
अब पुरुषार्थी परमेश्वरोपासक क्या प्राप्त करता है, यह कहते हैं।