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Samveda Mantra 572

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- अग्निश्चाक्षुषः Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः Kaand Name- पावमानं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- पावमानं पर्व
Mantra with Swara
सो꣡मः꣢ पुना꣣न꣢ ऊ꣣र्मि꣢꣫णाव्यं꣣ वा꣢रं꣣ वि꣡ धा꣢वति । अ꣡ग्रे꣢ वा꣣चः꣡ पव꣢꣯मानः꣣ क꣡नि꣢क्रदत् ॥५७२॥

सो꣡मः꣢꣯ । पु꣣नानः꣢ । ऊ꣣र्मि꣡णा꣢ । अ꣡व्य꣢꣯म् । वा꣡र꣢꣯म् । वि । धा꣣वति । अ꣡ग्रे꣢꣯ । वा꣣चः꣢ । प꣡व꣢꣯मानः । क꣡नि꣢꣯क्रदत् ॥५७२॥

Mantra without Swara
सोमः पुनान ऊर्मिणाव्यं वारं वि धावति । अग्रे वाचः पवमानः कनिक्रदत् ॥

सोमः । पुनानः । ऊर्मिणा । अव्यम् । वारम् । वि । धावति । अग्रे । वाचः । पवमानः । कनिक्रदत् ॥५७२॥

Samveda - Mantra Number : 572
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 10;

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Meaning
(सोमः) ब्रह्मानन्दरस (पुनानः) उपासक को पवित्र करता हुआ (ऊर्मिणा) लहर के साथ (अव्यं वारम्) भेड़ की ऊन से बने दशापवित्र के तुल्य दोषनिवारक अविनश्वर आत्मा के प्रति (वि धावति) वेग से दौड़ रहा है। (वाचः) प्रोच्चारित स्तुतिवाणी से (अग्रे) पहले ही (पवमानः) धारा रूप से बहता हुआ (कनिक्रदत्) कलकल ध्वनि कर रहा है ॥७॥ इस मन्त्र में ब्रह्मानन्द में कारणभूत स्तुति वाणी के उच्चारण से पूर्व ही ब्रह्मानन्द की उत्पत्ति का वर्णन होने से कारण के पूर्व कार्योदय वर्णित होना रूप अतिशयोक्ति अलङ्कार है ॥७॥
Essence
उपासकों से ध्यान किया गया परमेश्वर अपने पास से आनन्दरस की प्रचुर धाराओं को उपासकों के हृदय में प्रेरित करता है ॥७॥
Subject
अगले मन्त्र में पुनः ब्रह्मानन्दरस का विषय है।

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