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Samveda Mantra 56

1875 Mantra
Devata- ब्रह्मणस्पतिः Rishi- कण्वो घौरः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
प्रै꣢तु꣣ ब्र꣡ह्म꣢ण꣣स्प꣢तिः꣣ प्र꣢ दे꣣꣬व्ये꣢꣯तु सू꣣नृ꣡ता꣢ । अ꣡च्छा꣢ वी꣣रं꣡ न꣢꣯र्यं प꣣ङ्क्ति꣡रा꣢धसं दे꣣वा꣢ य꣣ज्ञं꣡ न꣢यन्तु नः ॥५६॥

प्र꣢ । ए꣣तु । ब्रह्म꣢꣯णः प꣡तिः꣢꣯ । प्र । दे꣣वी꣢ । ए꣣तु । सूनृ꣡ता꣢ । सु꣣ । नृ꣡ता꣢꣯ । अ꣡च्छ꣢꣯ । वी꣣र꣢म् । न꣡र्य꣢꣯म् । प꣣ङ्क्ति꣡रा꣢धसम् । प꣣ङ्क्ति꣢म् । रा꣣धसम् । देवाः꣢ । य꣣ज्ञ꣢म् । न꣣यन्तु । नः ॥५६॥

Mantra without Swara
प्रैतु ब्रह्मणस्पतिः प्र देव्येतु सूनृता । अच्छा वीरं नर्यं पङ्क्तिराधसं देवा यज्ञं नयन्तु नः ॥

प्र । एतु । ब्रह्मणः पतिः । प्र । देवी । एतु । सूनृता । सु । नृता । अच्छ । वीरम् । नर्यम् । पङ्क्तिराधसम् । पङ्क्तिम् । राधसम् । देवाः । यज्ञम् । नयन्तु । नः ॥५६॥

Samveda - Mantra Number : 56
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 6;

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Meaning
(ब्रह्मणस्पतिः) वेद, ब्रह्माण्ड तथा सकल ऐश्वर्य का स्वामी जगदीश्वर (प्र एतु) हमें प्राप्त हो। (देवी) दिव्यगुणयुक्त (सूनृता) प्यारी सच्ची वाणी (प्र एतु) हमें प्राप्त हो। (देवाः) विद्वान् और विदुषियाँ (नः) हमारे (यज्ञम्) राष्ट्ररूप यज्ञ के (अच्छ) प्रति (नर्यम्) नरहितकारी, (पङ्क्तिराधसम्) धर्मात्मा वीर मनुष्यों की पंक्तियों के सेवक और पंक्तियों के हितार्थ अपने धन को लगानेवाले, (वीरम्) शरीर और आत्मा के पूर्ण बल से युक्त सन्तान को (नयन्तु) प्राप्त करायें ॥२॥
Essence
वेद, ब्रह्माण्ड और सकल ऐश्वर्य का स्वामी जगदीश्वर, मधुर-प्रिय-सत्य वाणी और नरहितकर्ता, धर्मात्माओं का सेवक, सत्कार्यों में धन का दान करनेवाला पुत्र यदि प्राप्त हो जाता है तो निश्चय ही सभी सिद्धियाँ हाथ में आ जाती हैं ॥२॥
Subject
अगले मन्त्र का देवता ब्रह्मणस्पति है। हमें क्या-क्या प्राप्त हो, यह कहते हैं।

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