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Samveda Mantra 540

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- मन्युर्वासिष्ठः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः Kaand Name- पावमानं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- पावमानं पर्व
Mantra with Swara
इ꣡न्दु꣢र्वा꣣जी꣡ प꣢वते꣣ गो꣡न्यो꣢घा꣣ इ꣢न्द्रे꣣ सो꣢मः꣣ स꣢ह꣣ इ꣢न्व꣣न्म꣡दा꣢य । ह꣢न्ति꣣ र꣢क्षो꣣ बा꣡ध꣢ते꣣ प꣡र्यरा꣢꣯तिं꣣ व꣡रि꣢वस्कृ꣣ण्व꣢न्वृ꣣ज꣡न꣢स्य꣣ रा꣡जा꣢ ॥५४०॥

इ꣡न्दुः꣢꣯ । वा꣣जी꣢ । प꣣वते । गो꣡न्यो꣢꣯घाः । गो । न्यो꣣घाः । इ꣡न्द्रे꣢꣯ । सो꣡मः꣢꣯ । स꣡हः꣢꣯ । इ꣡न्व꣢꣯न् । म꣡दा꣢꣯य । ह꣡न्ति꣢꣯ । र꣡क्षः꣢꣯ । बा꣡ध꣢꣯ते । प꣡रि꣢꣯ । अ꣡रा꣢꣯तिम् । अ । रा꣣तिम् । व꣡रि꣢꣯वः । कृ꣣ण्व꣢न् । वृ꣣ज꣡न꣢स्य । रा꣡जा꣢꣯ ॥५४०॥

Mantra without Swara
इन्दुर्वाजी पवते गोन्योघा इन्द्रे सोमः सह इन्वन्मदाय । हन्ति रक्षो बाधते पर्यरातिं वरिवस्कृण्वन्वृजनस्य राजा ॥

इन्दुः । वाजी । पवते । गोन्योघाः । गो । न्योघाः । इन्द्रे । सोमः । सहः । इन्वन् । मदाय । हन्ति । रक्षः । बाधते । परि । अरातिम् । अ । रातिम् । वरिवः । कृण्वन् । वृजनस्य । राजा ॥५४०॥

Samveda - Mantra Number : 540
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 7;

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Meaning
(गोन्योघाः) गो-रसों के समान मधुर आनन्दरसों के समूह का स्वामी, (वाजी) वेगवान् (इन्दुः) तेजस्वी और रस से आर्द्र करनेवाला परमात्मा (पवते) उपासक के अन्तःकरण को पवित्र करता है। (सोमः) शान्तिदायक वह परमात्मा (मदाय) आनन्द देने के लिए (इन्द्रे) जीवात्मा में (सहः) बल को (इन्वन्) प्रेरित करता है। (वृजनस्य) बल का (राजा) राजा वह परमात्मा, अपने उपासकों को (वरिवः) शुभगुणों का अथवा योग-सिद्धियों का ऐश्वर्य (कृण्वन्) प्रदान करता हुआ (रक्षः) पापरूप राक्षस को (हन्ति) विनष्ट करता है, (अरातिम्) अदानभाव को (परि बाधते) सर्वथा दूर कर देता है ॥८॥
Essence
परमेश्वर उपासकों को गाय के दूध के समान मधुर आनन्दरसों को, आत्मबल को, सद्गुणों को एवं अणिमा आदि योगसिद्धियों को प्रदान करता हुआ उनके हृदय से अदानवृत्ति को बाधित करता हुआ और उनके पापरूप शत्रु का संहार करता हुआ उन्हें विजयी बनाता है ॥८॥
Subject
अगले मन्त्र में सोम परमात्मा के कर्मों का वर्णन है।

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