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Samveda Mantra 522

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- सप्तर्षयः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- पावमानं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- पावमानं पर्व
Mantra with Swara
प꣡व꣢माना असृक्षत प꣣वि꣢त्र꣣म꣢ति꣣ धा꣡र꣢या । म꣣रु꣡त्व꣢न्तो मत्स꣣रा꣡ इ꣢न्द्रि꣣या꣡ हया꣢꣯ मे꣣धा꣢म꣣भि꣡ प्रया꣢꣯ꣳसि च ॥५२२॥

प꣡वमा꣢꣯नाः । अ꣣सृक्षत । पवि꣡त्र꣢म् । अ꣡ति꣢꣯ । धा꣡र꣢꣯या । म꣣रु꣡त्व꣢न्तः । म꣣त्सराः꣢ । इ꣣न्द्रियाः꣢ । ह꣡याः꣢꣯ । मे꣣धा꣢म् । अ꣣भि꣢ । प्र꣡याँ꣢꣯सि । च꣣ ॥५२२॥

Mantra without Swara
पवमाना असृक्षत पवित्रमति धारया । मरुत्वन्तो मत्सरा इन्द्रिया हया मेधामभि प्रयाꣳसि च ॥

पवमानाः । असृक्षत । पवित्रम् । अति । धारया । मरुत्वन्तः । मत्सराः । इन्द्रियाः । हयाः । मेधाम् । अभि । प्रयाँसि । च ॥५२२॥

Samveda - Mantra Number : 522
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 5;

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Meaning
(पवमानाः) पवित्रता देते हुए ये ज्ञानरूप सोमरस (धारया) धारा रूप में (पवित्रम् अति) पवित्र हृदयरूप दशापवित्र में से छनकर (असृक्षत) आत्मारूप द्रोणकलश में छोड़े जा रहे हैं। (मरुत्वन्तः) प्राणों से युक्त, (मत्सरासः) तृप्तिप्रदाता, (इन्द्रियाः) आत्मा रूप इन्द्र से सेवित, (हयाः) प्राप्त होनेवाले ये ज्ञानरस (मेधाम्) धारणावती बुद्धि को (प्रयांसि च) और आनन्दरसों को (अभि) बरसाते हैं ॥१२॥
Essence
मन और प्राण से पवित्र किये गये ज्ञानरस जब आत्मा को प्राप्त होते हैं, तब मेधा और आनन्द के बरसानेवाले होते हैं ॥१२॥ इस दशति में भी सोम परमात्मा और उससे प्राप्त आनन्दधारा का वर्णन होने से इस दशति के विषय की पूर्व दशति के विषय के साथ संगति है ॥ षष्ठ प्रपाठक में प्रथम अर्ध की तृतीय दशति समाप्त ॥ पञ्चम अध्याय में पञ्चम खण्ड समाप्त ॥
Subject
अगले मन्त्र में ज्ञानरसों की प्राप्ति का वर्णन है।