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Samveda Mantra 51

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- सौभरि: काण्व: Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
प्र꣡ दैवो꣢꣯दासो अ꣣ग्नि꣢र्दे꣣व꣢꣫ इन्द्रो꣣ न꣢ म꣣ज्म꣡ना꣢ । अ꣡नु꣢ मा꣣त꣡रं꣢ पृथि꣣वीं꣡ वि वा꣢꣯वृते त꣣स्थौ꣡ नाक꣢꣯स्य꣣ श꣡र्म꣢णि ॥५१॥

प्र꣢ । दै꣡वो꣢꣯दासः । दै꣡वः꣢꣯ । दा꣣सः । अग्निः꣢ । दे꣣वः꣢ । इ꣡न्द्रः꣢꣯ । न । म꣣ज्म꣡ना꣢ । अ꣡नु꣢꣯ । मा꣣त꣡र꣢म् । पृ꣣थिवी꣢म् । वि । वा꣣वृते । तस्थौ꣢ । ना꣡क꣢꣯स्य । श꣡र्म꣢꣯णि ॥५१॥

Mantra without Swara
प्र दैवोदासो अग्निर्देव इन्द्रो न मज्मना । अनु मातरं पृथिवीं वि वावृते तस्थौ नाकस्य शर्मणि ॥

प्र । दैवोदासः । दैवः । दासः । अग्निः । देवः । इन्द्रः । न । मज्मना । अनु । मातरम् । पृथिवीम् । वि । वावृते । तस्थौ । नाकस्य । शर्मणि ॥५१॥

Samveda - Mantra Number : 51
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 5;

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1 Bhashyas
Meaning
(दैवोदासः) धार्मिक जनों का प्रिय, (देवः) प्रकाशक (अग्निः) जगन्नायक परमेश्वर (इन्द्रः न) बलवान् राजा के समान (मज्मना) बल से (प्र) प्रभावशाली और समर्थ बना हुआ है। आगे उसके सामर्थ्य का ही वर्णन है—वह (मातरम्) माता (पृथिवीम्) भूमि को (अनु वि वावृते) अनुकूलता से सूर्य के चारों ओर घुमा रहा है। वही परमेश्वर (नाकस्य) सूर्य के (शर्मणि) घर, सूर्यमण्डल में (तस्थौ) स्थित है अर्थात् सूर्य का संचालक भी वही है ॥७॥ इस मन्त्र में उपमालङ्कार है ॥७॥
Essence
जैसे कोई मानव राजा अपने बल से राष्ट्रभूमि को नियमों में चलाता है, वैसे ही परमात्मा भूमि को सूर्य के चारों ओर परिभ्रमण कराता है और आदित्य में भी निवास करता हुआ उसके द्वारा पृथिवी आदि ग्रहोपग्रहों को प्रकाशित करता है ॥७॥
Subject
अगले मन्त्र में परमात्मा की महिमा का वर्णन है।