Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Samveda Mantra 499

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- उचथ्य आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- पावमानं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- पावमानं पर्व
Mantra with Swara
अ꣡ध्व꣢र्यो꣣ अ꣡द्रि꣢भिः सु꣣त꣡ꣳ सोमं꣢꣯ प꣣वि꣢त्र꣣ आ꣡ न꣢य । पु꣣नाही꣡न्द्रा꣢य꣣ पा꣡त꣢वे ॥४९९॥

अ꣡ध्व꣢꣯र्यो । अ꣡द्रि꣢꣯भिः । अ । द्रि꣣भिः । सुत꣢म् । सो꣡म꣢꣯म् । प꣣वि꣡त्रे꣢ । आ । न꣣य । पुनाहि꣢ । इ꣡न्द्रा꣢꣯य । पा꣡त꣢꣯वे ॥४९९॥

Mantra without Swara
अध्वर्यो अद्रिभिः सुतꣳ सोमं पवित्र आ नय । पुनाहीन्द्राय पातवे ॥

अध्वर्यो । अद्रिभिः । अ । द्रिभिः । सुतम् । सोमम् । पवित्रे । आ । नय । पुनाहि । इन्द्राय । पातवे ॥४९९॥

Samveda - Mantra Number : 499
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 4;

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे (अध्वर्यो) यज्ञविधि के निष्पादक अध्वर्यु नामक ऋत्विज् के समान ज्ञानयज्ञ को निष्पन्न करनेवाले मानव ! तू (अद्रिभिः) सिलबट्टों के सदृश ज्ञानेन्द्रियों से (सुतम्) अभिषुत (सोमम्) सोम ओषधि के रस के सदृश ज्ञानरस को (पवित्रे) दशापवित्र के सदृश मन में (आ नय) ला, उस ज्ञान-रूप सोम-रस को (इन्द्राय पातवे) जीवात्मा के पान के लिए (पुनाहि) मनन द्वारा शुद्ध कर ॥३॥ इस मन्त्र में श्लेष से अभिहित भौतिक सोमपरक द्वितीय अर्थ उपमान-भाव में परिणत हो रहा है ॥३॥
Essence
जैसे यज्ञ में पीसने के साधन सिल-बट्टों से अभिषुत सोम दशापवित्र द्वारा छानकर ही पिया और पिलाया जाता है, वैसे ही ज्ञानार्जन की साधनभूत ज्ञानेन्द्रियों से अर्जित ज्ञान को मन से मनन द्वारा शुद्ध करना चाहिए ॥३॥
Subject
अगले मन्त्र में अध्वर्यु को प्रेरित किया गया है।