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Samveda Mantra 497

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- पावमानं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- पावमानं पर्व
Mantra with Swara
अ꣡चि꣢क्रद꣣द्वृ꣢षा꣣ ह꣡रि꣢र्म꣣हा꣢न्मि꣣त्रो꣡ न द꣢꣯र्श꣣तः꣢ । स꣡ꣳ सूर्ये꣢꣯ण दिद्युते ॥४९७॥

अ꣡चि꣢꣯क्रदत् । वृ꣡षा꣢꣯ । ह꣡रिः꣢꣯ । म꣣हा꣢न् । मि꣣त्रः꣢ । मि꣣ । त्रः꣢ । न । द꣣र्शतः꣢ । सम् । सू꣡र्ये꣢꣯ण । दि꣣द्युते ॥४९७॥

Mantra without Swara
अचिक्रदद्वृषा हरिर्महान्मित्रो न दर्शतः । सꣳ सूर्येण दिद्युते ॥

अचिक्रदत् । वृषा । हरिः । महान् । मित्रः । मि । त्रः । न । दर्शतः । सम् । सूर्येण । दिद्युते ॥४९७॥

Samveda - Mantra Number : 497
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 4;

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Meaning
(वृषा) मनोरथों को पूर्ण करनेवाला, (हरिः) पापहारी सोम परमेश्वर, सबके हृदयों में स्थित हुआ (अचिक्रदत्) शब्द कर रहा है अर्थात् उपदेश व सत्प्रेरणा दे रहा है। (महान्) महान् वह (मित्रः न) मित्र के समान (दर्शतः) दर्शनीय है। वही (सूर्येण) सूर्य से (सम्) संगत हुआ (दिद्युते) प्रकाशित हो रहा है। कहा भी है—‘जो वह आदित्य में पुरुष है, वह मैं ही हूँ’, य० ४०।१७ ॥१॥ इस मन्त्र में ‘अचिक्रदत् वृषा’ यहाँ पर शब्दशक्तिमूलक ध्वनि से ‘वर्षा करनेवाला बादल गर्ज रहा है’ यह दूसरा अर्थ भी सूचित होकर बादल और सोम परमात्मा में उपमानोपमेयभाव को ध्वनित कर रहा है, इसलिए उपमाध्वनि है। ‘मित्रो न दर्शतः’ में वाच्या पूर्णोपमा है ॥१॥
Essence
जो सूक्ष्मदर्शी लोग हैं, वे सूर्य, पर्जन्य आदि में परमेश्वर के ही दर्शन करते हैं, क्योंकि ताप, प्रकाश, जल बरसाने आदि की सब शक्ति उसी की दी हुई है ॥१॥
Subject
प्रथम मन्त्र में सोम परमात्मा की महिमा का वर्णन है।

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