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Samveda Mantra 491

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- मेध्यातिथिः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- पावमानं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- पावमानं पर्व
Mantra with Swara
प्र꣢꣫ यद्गावो꣣ न꣡ भूर्ण꣢꣯यस्त्वे꣣षा꣢ अ꣣या꣢सो꣣ अ꣡क्र꣢मुः । घ्न꣡न्तः꣢ कृ꣣ष्णा꣢꣫मप꣣ त्व꣡च꣢म् ॥४९१॥

प्र꣢ । यत् । गा꣡वः꣢꣯ । न । भू꣡र्ण꣢꣯यः । त्वे꣣षाः꣢ । अ꣣या꣡सः꣢ । अ꣡क्र꣢꣯मुः । घ्न꣡न्तः꣢꣯ । कृ꣣ष्ण꣢म् । अ꣡प꣢꣯ । त्व꣡च꣢꣯म् । ॥४९१॥

Mantra without Swara
प्र यद्गावो न भूर्णयस्त्वेषा अयासो अक्रमुः । घ्नन्तः कृष्णामप त्वचम् ॥

प्र । यत् । गावः । न । भूर्णयः । त्वेषाः । अयासः । अक्रमुः । घ्नन्तः । कृष्णम् । अप । त्वचम् । ॥४९१॥

Samveda - Mantra Number : 491
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 3;

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1 Bhashyas
Meaning
(यत्) जब (गावः न) सूर्य-किरणों के समान (भूर्णयः) धारण-पोषण करनेवाले, (त्वेषाः) दीप्तिमान्, (अयासः) क्रियाशील आनन्द-रस रूपी सोम (प्र अक्रमुः) पराक्रम दिखाते हैं, तब (त्वचम्) आवरण डालनेवाली (कृष्णाम्) तमोगुण की काली रात्रि को (ध्नन्तः) नष्ट कर देते हैं ॥५॥ इस मन्त्र में उपमालङ्कार है ॥५॥
Essence
ब्रह्मानन्द-रूप रसों का जब योगी जन पान कर लेते हैं, तब सभी मोह-निशाएँ उनके मार्ग से हट जाती हैं ॥५॥
Subject
अगले मन्त्र में यह वर्णन है कि परमात्मा से प्राप्त आनन्द-रस क्या करते हैं।