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Samveda Mantra 456

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वसिष्ठो मैत्रावरुणिः Chhand- एकपदा गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
इ꣢न्द्रो꣣ वि꣡श्व꣢स्य राजति ॥४५६॥

इ꣡न्द्रः꣢꣯ । वि꣡श्व꣢꣯स्य । रा꣣जति ॥४५६॥

Mantra without Swara
इन्द्रो विश्वस्य राजति ॥

इन्द्रः । विश्वस्य । राजति ॥४५६॥

Samveda - Mantra Number : 456
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 11;

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1 Bhashyas
Meaning
(इन्द्रः) परब्रह्म परमेश्वर (विश्वस्य) सकल ब्रह्माण्ड का, (इन्द्रः) अखण्ड जीवात्मा (विश्वस्य) सकल शरीर का, और (इन्द्रः) प्रजाओं से निर्वाचित राजा (विश्वस्य) सकल राष्ट्र का (राजति) सम्राट् है ॥१०॥ इस मन्त्र में अर्थश्लेषालङ्कार है ॥१०॥
Essence
परमात्मा, जीवात्मा और राजा को अपने-अपने क्षेत्र का सम्राट् मानकर उनसे यथायोग्य लाभ प्राप्त करने चाहिएँ ॥१०॥ इस दशति में अग्नि और इन्द्र नामों से परमात्मा, राजा आदि के गुण-कर्मों का वर्णन होने से, उषा नाम से प्राकृतिक और आध्यात्मिक उषा का वर्णन होने से, और ब्रह्माण्ड, शरीर तथा राष्ट्र में सब देवों के कर्तृत्व आदि का निरूपण होने से इस दशति के विषय की पूर्व दशति के विषय के साथ संगति है ॥ पञ्चम प्रपाठक में द्वितीय अर्ध की द्वितीय दशति समाप्त ॥ चतुर्थ अध्याय में ग्यारहवाँ खण्ड समाप्त ॥
Subject
अगले मन्त्र में इन्द्र के महत्त्व का वर्णन है।